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चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

Chanakya Niti Darpan Hindi

आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा

स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished132 पृष्ठ

९४ | चाणक्यनीतिदर्पणः

आगे होनेवाली के ही लिए चिन्ता करो। समझदार लोग सामने की बात को ही हल करने की चिन्ता करते हैं ॥२॥

स्वभावेन हि तुष्यन्ति देवाः सत्पुरुषाः पिता ।
ज्ञातयः स्नान-पानाभ्यां वाक्यदानेन पंडिताः ॥३॥

दोहा— देव सत्पुरुष औ पिता, करहिं सुभाव प्रसाद ।
स्नानपान लहि बन्धु सब, पंडित पाय सुवाद ॥३॥

देवता, भलेमानुष और बाप ये तीन स्वभाव देखकर प्रसन्न होते हैं। भाई वृन्द स्नान और पान से तथा वाक्य पालन से पण्डित लोग खुश होते हैं ॥३॥

आयुः कर्म च वित्तञ्च विद्या निधनमेव च ।
पञ्चैतानि च सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः ॥४॥

दोहा— आयुर्बल धन कर्म औ, विद्या मरण बनाय ।
पाँचो रहते गर्भ में, जीवन के रचि जाय । ४॥

आयु, कर्म, सम्पत्ति, विद्या और मरण ये पाँच बातें तभी तय हो जाती हैं, जब कि मनुष्य गर्भ में ही रहता है ॥४॥

अहो बत ! विचित्राणि चरितानि महात्मनाम् ।
लक्ष्मीं तृणाय मन्यन्ते तद्भारेण नमन्ति च ॥५॥

दोहा— अचरज चरित विचित्र अति, बड़े जनन के आहि ।
जो तृण सम सम्पति मिले, तासु भार नै जाहिं ॥५॥

अहो ! महात्माओं के चरित्र भी विचित्र होते हैं। वैसे तो ये लक्ष्मी को तिनके की तरह समझते हैं। और जब वह आ ही जाती हैं तो इनके भार से दबकर नम्र हो जाते हैं ॥५॥

चाणक्यनीतिदर्पणः ९५

यस्य स्नेहो भयं तस्य स्नेहो दुःखस्य भाजनम् ।
स्नेहमूलानि दुःखानि तानि त्यक्त्वा वसेत्सुखम् ॥ ६॥
दोहा–जाहि प्रीति भय ताहिको, प्रीति दुःख को पात्र ।
प्रीति मूल दुख त्यागि के, बसै तब सुख मात्र ॥६॥
जिसके हृदय में स्नेह (प्रीति) है, उसको भय है। जिसके पास स्नेह है, उसको दुःख है। जिसके हृदय में स्नेह है, उसी के पास तरह-तरह के दुःख रहते हैं, जो इसे त्याग देता है वह सुख से रहता

अनागतविधाता च प्रत्युत्पन्नमतिस्तथा ।
द्वावेतौ सुखमेधेते यद्भविष्यो विनश्यति ॥ ७ ॥
दोहा–पहिलहिं करत उपाय जो, परैंहु तुरत जेहि सूझ ।
दुहुन बढ़त सुख मरत जो, होनी गुणत असूझ ॥७॥
जो मनुष्य भविष्य में आनेवाली विपत्तिसे होशियार है और जिसकी बुद्धि समय पर काम कर जाती है ये दो मनुष्य आनन्द से आगे बढ़ते जाते हैं। इनके विपरीत जो भाग्य में लिखा होगा वह होगा, जो यह सोचकर बैठनेवाले हैं, उनका नाश निश्चित है।

राज्ञधर्मणि धर्मिष्ठाः पापे पापाः समे समाः ।
राजानमनुवर्तन्ते यथा राजा तथा प्रजाः ॥ ८ ॥
दोहा–नृप धरमी धरमी प्रजा, पाप पाप मति जान ।
सम्मत सम भूपति तथा, परगट प्रजा पिछान ॥८॥


१. 'राज्ञि धर्मिणि' इत्यपि पाठः ।

९६ चाणक्यनीतिदर्पणः

राजा यदि धर्मात्मा होता है तो उसकी प्रजा भी धर्मात्मा होती है, राजा पापी होता है तो उसकी प्रजा भी पापी होती है। सम राजा होता है तो प्रजा भी सम ही होती है। कहने का भाव यह कि सब राजा का ही अनुसरण करते हैं। जैसा राजा होगा, उसकी प्रजा भी वैसी ही होगी ॥८॥

जीवन्तं मृतवन्मन्ये देहिनं धर्मवर्जितम् । मृतो धर्मेण संयुक्तो दीर्घजीवी न संशयः ॥ ९ ॥

दोहा--जीवन ही समुझैँ मरेउ, मनुजहिं धर्म विहीन । नहिं संशय निरजीव सो, मरेउ धर्म जेहि कीन ॥९॥

धर्मविहीन मनुष्य को मैं जीते मुर्दे की तरह मानता हूँ। जो धर्मात्मा था, पर मर गया तो वह वास्तव में दीर्घजीवी था ॥९॥

धर्मार्थकाममोक्षाणां यस्यैकोऽपि न विद्यते । अजागलस्तनस्येव तस्य जन्म निरर्थकम् ॥१०॥

दोहा--धर्म, अर्थ, अरु, मोक्ष, न एको है जासु । अजाकंठ कुचके सरिस, व्यर्थ जन्म ह तासु ॥१०॥

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार पदार्थों में से एक पदार्थ भी जिसके पास नहीं है, तो बकरी के गले में लटकने-वाले स्तनों के समान उसका जन्म ही निरर्थक है ॥१०॥

दह्यमानाः सुतीव्रेण नीचाः परयशोऽग्निना । अशक्तास्तत्पदं गन्तुं ततो निन्दां प्रकुर्वते ॥११॥

७ चाणक्यनीतिदर्पणः ९७

दोहा-और अगिन यश दुसह सो, जरि जरि दुर्जन नीच । आप न तैसी करि सकैं, तब तिहिं निन्दहिं बीच ॥११॥

नीच प्रकृति के लोग औरों के यशरूपी अग्नि से जलते रहते हैं उस पद तक तो पहुँचने की सामाथ्र्य उनमें रहती नहीं। इसलिए वे उसकी निन्दा करने लग जाते हैं ॥११॥

बन्धाय विषयासङ्गं मुक्त्यै निर्विषयं मनः । मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ॥१२॥

दोहा-विषय सङ्ग परिबन्ध है, विषय हीन निर्वाह । बंध मोक्ष इन दुहुंन को, कारण मनै न आन ॥१२॥

विषयों में मन का, लगाना ही बन्धन है और विषयों से मन को हटाना ही मुक्ति है । भाव यह कि मन ही मनुष्यों के बन्धन और मोक्ष का हेतु है ॥१२॥

देहाभिमानगलिते ज्ञानेन परमात्मनः । यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र समाधयः ॥१३॥

दोहा-ब्रह्मज्ञान सो देह को, विगत भये अभिमान । जहाँ जहाँ मन जात है, तहाँ समाधिहिं जान ॥१३॥

परमात्मज्ञान से मनुष्य का जब देहाभिमान गल जाता है तो फिर जहाँ कहीं भी उसका मन जाता है तो उसके लिए सर्वत्र समाधि ही है ॥१३॥

ईप्सितं मनसः सर्वं कस्य सम्पद्यते सुखम् । दैवायत्तं यतः सर्वं तस्मात् संतोषमाश्रयेत् ॥१४॥

९४ चाणक्यनीतिदर्पणं।

दोहा—इच्छित सब सुख केहि मिलत, जब सब दैवाधीन यहि ते संतोषहिं शरण, चहैं चतुर कहँ कीन ॥१४॥

अपने मन के अनुसार सुख किसे मिलता है। क्योंकि संसार का सब काम दैव के अधीन है। इसलिये जितना सुख प्राप्त हो जाय, उतने में ही सन्तुष्ट रहो ॥१४॥

यथा धेनुसहस्रेषु वत्सो गच्छति मातरम् । तथा यच्च कृतं कर्म कर्तारमनुगच्छति ॥१५॥

दोहा—जैसे धेनु हजार में, वत्स जाय लखि मात । तैसे ही किन्हें करम, करतहिं के ढिग जात ॥१५॥

जैसे हजारों गौओं में बछड़ा अपनी ही माँ के पास जाता है। उसी तरह प्रत्येक मनुष्य का कर्म ( भाग्य ) अपने स्वामी के ही पास जा पहुँचता है ॥१५॥

अनवस्थितकार्यस्य न जने न वने सुखम् । जनो दहति संसर्गाद्वनं संगविवर्जनात् ॥१६॥

दोहा—अनथिर कारज ते न सुख, जन औ वन दुहुँ माहिं । जन तेहि दाहै, सङ्ग ते, वन असंग ते दाहि ॥१६॥

जिसका कार्य अव्यवस्थित रहता है उसे न समाज में सुख है, न वन में। समाज में वह संसर्ग से दुःखी रहता है तो वन में संसर्ग त्याग से दुखी रहेगा ॥१६॥

यत् खनित्वा खनित्रेण भूतले वारि विन्दति । तथा गुरुगतां विद्यां शुश्रूषुरधिगच्छति ॥१७॥

चाणक्यनीतिदर्पणः ९९

दोहा—जिमि खोदत ही ते मिले, भूतल के मधि वारि ।
तैसेहि सेवा के किये, गुरु विद्या मिलि धारि ॥१७.।

जैसे फावड़े से खोदने पर पृथ्वी से जल निकल आता है । उसी तरह किसी गुरु के पास विद्यमान विद्या उसकी सेवा करने से प्राप्त हो जाती है ॥१७ ॥

कर्मायत्तं फलं पुंसां बुद्धिः कर्मानुसारिणी ।
तथाऽपि सुधियश्चार्या सुविचार्यैव कुर्वते ॥१८॥

दोहा—फलसिधि कर्म अधीन है, बुद्धि कर्म अनुसार ।
तौहू सुमति महान जन, करम करहिं सुविचार ॥१८॥

यद्यपि प्रत्येक मनुष्य को कर्मानुसार ही फल प्राप्त होता है और बुद्धि भी कर्मानुसार ही बनती है । फिर भी बुद्धिमान् लोग अच्छी तरह समझ-बूझ कर ही कोई काम करते हैं ॥१८॥

एकाक्षरप्रदातारं यो गुरुं नाऽभिवन्दते ।
श्वानयोनिशतं भुक्त्वा चांडालेष्वभिजायते ॥१९॥

दोहा—एक अक्षरदातुहु गुरुहि, जो नर वन्दे नाहिं ।
जन्म सैकड़ों श्वान ह्वै, जनै चण्डालन माहिं ॥१९॥

एक अक्षर देनेवाले को भी जो मनुष्य अपना गुरु नहीं मानता तो वह सैकड़ों बार कुत्ते की योनि में रह-रह कर अन्त में चाण्डाल होता है ॥१९॥

१००चाणक्यनीतिदर्पणः

युगान्ते प्रचलेन्मेरुः कल्पान्ते सप्त सागराः ।
साधवः प्रतिपन्नार्थान्न चलन्ति कदाचन ॥२०॥

दोहा—सात सिन्धु कल्पान्त चलु, मेरु चलै युग अन्त ।
परे प्रयोजन ते कबहुँ, नहिं चलते हैं सन्त ॥२०॥

युग का अन्त हो जाने पर सुमेरु पर्वत डिग जाता है । कल्प का अन्त होने पर सातो सागर भी चंचल हो उठते हैं, पर सज्जन लोग स्वीकार किये हुये मार्ग से विचलित नहीं होते ॥२०॥

पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि अन्नमापः सुभाषितम् ।
मूढैः पाषाणखण्डेषु रत्नसंख्या विधीयते ॥२१॥

म०छ०--अन्न बारि चारु बोल तीनि रत्न भू अमोल ।
मूढ़ लोग के पषान टूक रत्न के पषान ॥२१ ॥

सच पूछो तो पृथिवी भर में तीन ही रत्न हैं--अन्न, जल और मीठी-मीठी बातें । लेकिन बेवकूफ लोग पत्थर के टुकड़ों को ही रत्न मानते हैं ॥२१॥

इति चाणक्ये त्रयोदशोऽध्यायः ॥१३॥


अथ चतुर्दशोऽध्यायः ॥१४॥

आत्मापराधवृक्षस्य फलान्येतानि देहिनाम् ।
दारिद्र्य-रोग-दुःखानि बन्धनव्यसनानि च ॥१॥

चाणक्यनीतिदर्पणः १०१

म०छ०--निर्धनत्व दुःख बन्ध और विपत्ति सात ।
है स्वकर्म वृक्ष जात ये फलैं धरैक गात ॥१॥

मनुष्य अपने द्वारा पल्लवित अपराध रूपी वृक्ष के ये ही फल फलते हैं--दरिद्रता, रोग, दुःख, बन्धन ( कैद ) और व्यसन ॥१॥

पुनर्वित्तम्पुनर्मित्रं पुनर्भार्या पुनर्मही ।
एतत्सर्वं पुनर्लभ्यं न शरीरं पुनः पुनः ॥२॥

म०छ०--फेरि वित्त फेरि मित्त, फेरि तो धराहु नित्त ।
फेरि फेरि सर्व एह, ये मानुषी मिलै न देह ॥२॥

गया हुआ धन वापस मिल सकता है, रूठा हुआ मित्र भी राजी किया जा सकता है, हाथ से निकली हुई स्त्री भी फिर वापस आसकती है और छीनी हुई जमीन भी फिर मिल सकती है, पर गया हुआ यह शरीर वापस नहीं मिल सकता ॥२॥

बहूनां चैव सत्त्वानां समवायो रिपुञ्जयः ।
वर्षन्धाराधरो मेघस्तृणैरपि निवार्यते ॥३॥

म०छ०--एक ह्वै अनेक लोग वीर्य शत्रु जीत योग ।
मेघ धारि बारि जेत घास ढेर बारि देत ॥३॥

बहुत प्राणियों का सङ्गठित बल शत्रु को परास्त कर देता है, प्रचण्ड वेग के साथ बरसते हुए मेघ को सङ्गठन के बल से क्षुद्र तिनके हरा देते हैं ॥३॥

१०२ चाणक्यनीतिदर्पणः

जले तैलं खले गुह्यं पात्रे दानं मनागपि ।
प्राज्ञे शास्त्रं स्वयं याति विस्तारं वस्तुशक्तितः ॥४॥

म०छ०-थोर तेल वारि माहिं । गुप्तहू खलानि माहिं ।
दान शास्त्र पात्रज्ञानि । ये बड़े स्वभाव आहि ॥४॥

जल में तेल, दुष्ट मनुष्य में कोई गुप्त बात, सुपात्र में थोड़ा भी दान और समझदार मनुष्य के पास शास्त्र, ये थोड़े होते हुए भी पात्र के प्रभाव से तुरन्त फैल जाते हैं ॥४॥

धर्माख्याने श्मशाने च रोगिणां या मतिर्भवेत् ।
सा सर्वदैव तिष्ठेच्चेत्को न मुच्येत बन्धनात् ॥५॥

म०छ०-धर्म वीरता मशान । रोग माहिं जौन ज्ञान ।
जो रहे वही सदाइ । बन्ध को न मुक्त हांइ ॥५॥

कोई धार्मिक आख्यान सुनने पर, श्मशान में और रुग्णावस्था में मनुष्य की जैसी बुद्धि रहती है, वैसी यदि हमेशा रहे तो कौन मनुष्य मोक्षपद न प्राप्त कर ले ? ॥५॥

उत्पन्नपश्चात्तापस्य बुद्धिर्भवति यादृशी ।
तादृशी यदि पूर्वं स्यात्कस्य स्यान्न महोदयः ॥६॥

म०छ०-आदि चूकि अन्त शोक । जो रहे विचारि दोष ।
पूर्वही बनै जो बैस । कौन को मिले न ऐश ॥६॥

कोई बुरा काम करने पर पछतावे के समय मनुष्य की जैसी बुद्धि रहती है, वैसी यदि पहले ही से रहे तो कौन मनुष्य उन्नत न हो जाय ॥६॥

चाणक्यनीतिदर्पणः १०३

दाने तपसि शौर्ये वा विज्ञाने विनये नये । विस्मयो न हि कर्तव्यो बहुरत्ना बसुन्धरा ॥७॥

म०छ०--दान नय विनय नगीच शूरता विज्ञान बीच । कीजिये अचर्ज नाहिं, रत्न ढेर भूमि माहिं ॥७॥

दान, तप, वीरता, विज्ञान और नीति, इनके विषय में कभी किसी को विस्मित होना ही नहीं चाहिये । क्योंकि पृथ्व्री में बहुत से रत्न भरे पड़े हैं ॥७॥

दूरस्थोऽपि न दूरस्थो यो यस्य मनसि स्थितः । यो यस्य हृदये नास्ति समीपस्थोऽपि दूरतः ॥८॥

म०छ०--दूरहू बसै नगीच, जासु जौन चित्त बीच । जो न चित्त जासु पूर । है समीपहूँ सो दूर ॥८॥

जो (मनुष्य) जिसके हृदय में स्थान किये है, वह दूर रहकर भी दूर नहीं है । जो जिसके हृदय में नहीं रहता, वह समीप रहने पर भी दूर है ॥८॥

यस्माच्च प्रियमिच्छेत्तु तस्य ब्रूयात्सदा प्रियम् । व्याधो मृगवधं गन्तुं गीतं गायति सुस्वरम् ॥६॥

म०छ०--जाहिते चहे सुपास, मीठी बोली तासु पास । व्याध मारिबे मृगान, मंत्र गावती सुगान ॥९॥

मनुष्य को चाहिए कि जिस किसी से अपना भला चाहता हो उससे हमेशा मीठी बातें करे । क्योंकि बहेलिया जब हिरन का शिकार करने जाता है तो बड़े मीठे स्वर से गाता है ॥९॥

१०४ | चाणक्यनीतिदर्पणः

अत्यासन्ना विनाशाय दूरस्था न फलप्रदाः ।
सेव्यतां मध्यभागेन राजवह्निगुरुस्त्रियः ॥१०॥
म०छ०--अति पास नाश हेत, दूरहू ते फल न हेत ।
सेवनीय मध्य भाग, गुरु, भूप नारि आग ॥१०॥
राजा, अग्नि, गुरु और स्त्रियाँ--इनके पास अधिक रहने पर विनाश निश्चित है और दूर रहा जाय तो कुछ मतलब नहीं निकलता । इसलिए इन चारों की आराधना ऐसे करे कि न ज्यादा पास रहे न ज्यादा दूर ॥१०॥

अग्निरापः स्त्रियो मूर्खाः सर्पो राजकुलानि च ।
नित्यं यत्नेन सेव्यानि सद्यः प्राणहराणि षट्॥११॥
म०छ०--अग्नि सर्प मूर्ख नारि, राजवंश और वारि ।
यत्न साथ सेवनीय, सद्य ये हरैं छ जीय ॥११॥
आग, पानी, मूर्ख, नारी और राज-परिवार इनकी यत्न के साथ आराधना करै । क्योंकि ये सब तुरन्त प्राण लेने वाले जीव हैं ॥११॥

स जीवति गुणा यस्य यस्य धर्मः स जीवति ।
गुणधर्मविहीनस्य जीवितं निष्प्रयोजनम् ॥१२॥
म०छ०--जीवतो गुणी जो होय, या सुधर्म युक्त जीव ।
धर्म और गुणी न जासु, जीवनो सुव्यर्थ तासु ॥१२॥
जो गुणी है, उसका जीवन सफल है या जो धर्मात्मा है, उसका जन्म सार्थक है । इसके विपरीत गुण और धर्म से विहीन जीवन निष्प्रयोजन है ॥१२॥

चाणक्यनीतिदर्पणः १०५

यदिच्छसि वशीकर्त्तुं जगदेकेन कर्मणा । पुरः पञ्चदशास्येभ्यो गां चरन्तीं निवारय ॥१३॥

मं०छ०—चाहते वशै जो कीन, एक कर्म लोक तीन । पन्द्रहों के तों मुखान, जान तो बहार आन ॥१३॥

यदि तुम केवल एक काम से सारे संसार को अपने वश में करना चाहते हो तो पन्द्रह मुखवाले राक्षस के सामने चरती हुई इन्द्रयरूपी गैयों को उधरसे हटा लो । ये पन्द्रह मुख कौन हैं—आँख, नाक, कान, जीभ और त्वचा ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ । मुख, पाँव, लिंग और गुदा, ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ। रूप, रस, गन्ध शब्द और स्पर्श, ये पाँच ज्ञानेन्द्रियों के विषय हैं ॥१३॥

प्रस्तावसदृशं वाक्यं प्रभावसदृशं प्रियम् । आत्मशक्तिसमं कोपं यो जानाति स पण्डितः॥१४॥

सो०—प्रिय स्वभाव अनुकूल, योग प्रसंगे वचन पुनि । निजबल के समतूल, कोष जान पण्डित सोई ॥१४॥

जो मनुष्य प्रसंगानुसार बात, प्रकृति के अनुकूल प्रेम और अपनी शक्ति के अनुसार क्रोध करना जानता है, वही पंडित है ॥१४॥

एक एव पदार्थस्तु त्रिधा भवति वीक्षितः । कुणपं कामिनी मांसं योगिभिः कामिभिः श्वभिः॥१५॥

सो०—वस्तु एक ही होय, तीनि तरह देखी गई । रति मृत माँसू सोय, कामी योगी कुकुर सो ॥१५॥

एक स्त्री के शरीर को तीन जीव तीन दृष्टि से देखते हैं—योगी

१०६ . चाणक्यनीतिदर्पणः

उसे बदबूदार मुर्दे के रूप में देखते हैं कामी उसे कामिनी समझता है और कुत्ता उसे मांसपिण्ड जानता है ॥१५॥

सुसिद्धमौषधं धर्मं गृहच्छिद्रं च मैथुनम् ।
कुभुक्तं कुश्रुतं चैव मतिमान्न प्रकाशयेत् ॥१६॥

सो०--सिद्धौषध धौ धर्म, मैथुन कुवचन भोजनो ।
अपने घरको मर्म, चतुर नहीं प्रगठित करै ॥१६॥

बुद्धिमान् को चाहिए कि इन बातों को किसी से न जाहिर करे—अच्छी तरह तैयार की हुई औषधि, धर्म, अपने घर का दोष, दूषित भोजन और निंद्य किं वदन्ती बचन ॥१६॥

तावन्मौनेन नीयन्ते कोकिलैश्चैव वासराः ।
यावत्सर्वजनानन्ददायिनी वाक् प्रवर्तते ॥१७॥

सो०- तौलौं मौने ठानि, कोकिलहू दिन काटते ।
जौलौं आनन्द खानि, सब को वाणी होत है ॥१७॥

कोयलें तब तक चुपचाप दिन बिता देती हैं जबतक कि वे सब लोगों के मनको आनन्दित करनेवाली वाणी नहीं बोलती हैं। १७।

धर्मं धनं च धान्यं च गुरोर्वचनमौषधम् ।
सुगृहीतं च कर्त्तव्यमन्यथा तु न जीवति ॥१८॥

सो०--धर्म धान्य धनज्ञानि, गुरु वच औषध पाँच यह ।
धार रक्षण अरु हित जानि, अन्यथा जीवन नाहिं यह ॥१८॥

धर्म, धन, अन्न, गुरु का वचन और औषधि इन वस्तुओं को सावधानी के साथ अपनावे और उनके अनुसार चले । जो ऐसा नहीं करता, वह नहीं जीता है ॥१८॥

चाणक्यनीतिदर्पणः १०७

त्यज दुर्जनसंसर्गं भज साधुसमागमम् । कुरु पुण्यमहोरात्रं स्मर नित्यमनित्यतः ॥१९॥

सो०--तजौ दुष्ट सहवास, भजो साधु सङ्गम रुचिर । करौ पुण्य परकास, हरि सुमिरो जग नित्यहिं ॥१९॥

दुष्टों का साथ छोड़ दो, भले लोगों के समागम में रहो, अपने दिन और रात को पवित्र करके बिताओ और इस अनित्य संसार में नित्य ईश्वर का स्मरण करते रहो ॥१९॥

इति चाणक्ये चतुर्दशोऽध्यायः ॥१४॥

*

अथ पञ्चदशोऽध्यायः ॥१५॥

यस्य चित्तं द्रवीभूतं कृपया सर्वजन्तुषु । तस्य ज्ञानेन मोक्षेण किं जटाभस्मलेपनेः ॥१॥

दोहा--जासु चित्त सब जन्तु पर, गलित दया रस माह । तासु ज्ञान मुक्ति जटा, भस्म लेप कर काह ॥१॥

जिसका चित्त दया के कारण द्रवीभूत हो जाता है तो उसे फिर ज्ञान, मोक्ष, जटाधारण तथा भस्मलेपन की क्या आवश्यकता है ? ॥१॥

एकमेवाक्षरं यस्तु गुरुः शिष्यं प्रबोधयेत् । पृथिव्यां नास्ति तद्द्रव्यं यद् दत्त्वा चानृणी भवेत् ॥२॥

दोहा--एकौ अक्षर जो गुरु, शिष्यहिं देत जनाय । भूमि माहि धन नाहिं वह, जोदे अनृण कहाय ॥२॥

१०८ चाणक्यनीतिदर्पणः

यदि गुरु एक अक्षर भी बोलकर शिष्य को उपदेश दे देता है तो पृथिवी में कोई ऐसा द्रव्य है ही नहीं जिसे देकर उस गुरु से उऋण हुआ जाय ॥२॥

खलानां कण्टकानां च द्विविधैव प्रतिक्रिया ।
उपानद्मुखभङ्गो वा दूरतैव विसर्जनम् ॥३॥

दोहा--खल काँटा इन दुहुन को, दोई अहँ उपाय ।
जूतन ते मुख तोड़ियो, रहिबो दूरी बचाय ॥३॥

दुष्ट मनुष्य और कण्टक, इन दोनों के प्रतिकार के दो ही मार्ग हैं । या तो उनके लिए पनही ( जूते ) का उपयोग किया जाय या उन्हें दूर ही से त्याग दे ॥३॥

कुचैलिनं दन्तमलोपधारिणं
बह्वाशिनंनिष्ठुरभाषिणं च ।
सूर्योदये वाऽस्तमिते शयानं ।
विमुञ्चति श्रीर्यदि चक्रपाणिः ॥४॥

दोहा--वसन दसन राखै मलिन, बहु भोजन कटु बैन ।
सोवै रवि पिछवतु जगत, तजै जो श्री हरि ऐन ॥४॥

मैले कपड़े पहननेवाला, मैले दाँतवाला, भुक्खड़, नीरस बातें करनेवाला और सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय तक सोनेवाला यदि ईश्वर ही हो तो उसे भी लक्ष्मी त्याग देती हैं ॥४॥

त्यजन्ति मित्राणि धनैर्विहीनं
दाराश्च भृत्याश्च सुहृज्जनाश्च ।

चाणक्यनीतिदर्पण। १०९

तं चार्थवन्तं पुनराश्रयन्ते ।
ह्यर्थो हि लोके पुरुषस्य बन्धुः ॥५॥

दोहा--तजहिं तीय हित मीत औ, सेवक धन जब नाहिं ।
धन आये बहुरैं सबै धन वन्धू जग माहिं ॥५॥

निर्धन मित्र को मित्र, स्त्री, सेवक और सगे सम्बन्धी छोड़ देते हैं और वही जब फिर धनी हो जाता है तो वे लोग फिर उसके साथ हो लेते हैं । मतलब यह, संसार में धन ही मनुष्य का बन्धु है ॥५॥

अन्यायोपार्जितं द्रव्यं दश वर्षाणि तिष्ठति ।
प्राप्ते एकादशे वर्षे समूलं च विनश्यति ॥६॥

दोहा--करि अनिति धन जोरेऊ, दशे वर्ष ठहराय ।
ग्यारहवें के लागते, जड़ौ मूलते जाय ॥६॥

अन्याय से कमाया हुआ धन केवल दस वर्ष तक टिकता है, ग्यारहवाँ वर्ष लगने पर वह मूल धन के साथ नष्ट हो जाता है ॥६॥

अयुक्तं स्वामिनो युक्तं युक्तं नीचस्य दूषणम् ।
अमृतं राहवे मृत्युर्विषं शंकरभूषणम् ॥७॥

दोहा--खोटो भल समरथ पँह, भलौ खोट लहि नीच ।
विषौ भयो भूषण शिवहिं, अमृत राहु कँह मीच ॥७॥

अयोग्य कार्य भी यदि कोई प्रभावशाली व्यक्ति कर गुजरे तो वह उसके लिए योग्य हो जाता है और नीच प्रकृति का मनुष्य यदि उत्तम काम भी करता है तो वह उसके करने से

११० चाणक्यनीतिदर्पणः

अयोग्य सावित हो जाता है। जैसे अमृत भी राहु के लिए मृत्यु का कारण बन गया और विष भी शिवजीके कण्ठका शृङ्गार हो गया ॥७॥

तद्भोजनं यद् द्विजभुक्तशेषं
तत्सौहृदं यत्क्रियते परस्मिन्।
सा प्राज्ञता या न करोति पापं
दम्भं विना यः क्रियते स धर्मः ॥८॥

दोहा—द्विज उबरैउ भोजन सोई, पर सो मैत्री सोय।
जेहि न पाप वह चतुरता, धर्म दम्भ बिनुसोय ॥८॥

वही भोजन भोजन है, जो ब्राह्मणों के जीम लेने के बाद बचा हो, वही, प्रेम, प्रेम है जो स्वार्थ वश अपने ही लोगों में न किया जाकर औरों पर भी किया जाय। वही विज्ञता (समझदारी) है कि जिसके प्रभाव से कोई पाप न हो सके और वही धर्म है कि जिसमें आडम्बर न हो ॥८॥

मणिलुण्ठति पादाग्रे काचः शिरसि धार्यते।
क्रयविक्रयवेलायां काचः काचो मणिर्मणिः ॥६॥

दोहा—मणि लोटत रहु पाँव तर, काँच रह्यो शिर नाय।
लेत देत मणिही रहे, काँच काँच रहि जाय ॥९॥

वैसे मणि पैरों तले लुढ़के और काँच माथे पर रखा जाय तो इसमें उन दोनों के विषय में कुछ नहीं कहा जा सकता। पर जब वे दोनों बाजार में बिकने आवेंगे और उनका क्रय-विक्रय होने लगेगा तब काँच-काँच ही रहेगा और मणि मणि ही ॥९॥

चाणक्यनीतिदर्पणः १११

अनन्तशास्त्रं बहुलाश्च विद्याः अल्पं च कालो बहुविघ्नता च । यत्सारभूतं तदुपासनीयं, हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात् ॥१०॥

दोहा—बहुत विघ्न कम काल है, विद्या शास्त्र अपार । जल से जैसे हंस पय, लीजै सार निसार ॥१०॥

शास्त्र अनन्त हैं, बहुत सी विद्यायें हैं, थोड़ा सा समय 'जीवन' है और उसमें बहुत से विघ्न हैं । इसलिये समझदार मनुष्य को उचित है जैसे हंस सबको छोड़कर पानी से दूध केवल लेता है, उसी तरह जो अपने मतलब की बात हो, उसे ले ले बाकी सब छोड़ दे ॥१०॥

दूरागतं पथि श्रान्तं वृथा च गृहमागतम् । अनर्चयित्वा यो भुङ्क्ते स वै चाण्डाल उच्यते ॥११॥

दोहा—दूर देश से राह थकि, बिनु कारज घर आय । तेहि बिनु पूजे खाय जो, चाण्डाल कहलाय ॥११॥

जो दूर से आ रहा हो इन अभ्यागतों की सेवा किये बिना जो भोजन कर लेता है उसे चाण्डाल कहना चाहिए ॥११॥

पठन्ति चतुरो वेदान् धर्मशास्त्राण्यनेक॒शः । आत्मानं नैव जानन्ति दर्वी पाकरसं यथा ॥१२॥

दोहा—पढ़े चारहूँ वेदहुँ, धर्म शास्त्र बहु बाद । आपुहिं जानै नाहिं ज्यों, करिद्धिहिं व्यञ्जन स्वाद ॥१२॥

११२ चाणक्यनीतिदर्पणः

कितने लोग चारो वेद और बहुत से धर्मशास्त्र पढ़ जाते हैं, पर वे आपको नहीं समझ पाते, जैसे कि कलछुल पाक में रहकर भी पाक का स्वाद नहीं जान सकती ॥१२॥

धन्या द्विजमयी नौका विपरीता भवार्णवे ।
तरन्त्यधोगताः सर्वे उपरिस्थाः पतन्त्यधः ॥१३॥

दोहा—भवसागर में धन्य है, उलटी यह द्विज नाव ।
नीचे रहि तर जात सब, ऊपर रहि बुड़ि जाय ॥१३॥

यह द्विजमयी नौका धन्य है, कि जो इस संसाररूपी सागरमें उलटे तौर पर चलती है । जो इससे नीचे (नम्र) रहते हैं, वे तर जाते हैं और जो ऊपर (उद्धत) रहते, वे नीचे चले जाते हैं ॥१३॥

अयममृतनिधानं नायकोऽप्योषधीनाम् ।
अमृतमयशरीरः कान्तियुक्तोऽपि चन्द्रः ॥
भवति विगतरश्मिर्मण्डलं प्राप्य भानोः ।
परसदननिविष्टः को लघुत्वं न याति ॥१४॥

दोहा—सुधा धाम औषधिपति, छवि युत अमीय शरीर ।
तऊ चंद्र रविढिग मलिन, पर घर कौन गम्भीर ॥१४॥

यद्यपि चन्द्रमा अमृत का भण्डार है, ओषधियों का स्वामी है; स्वयं अमृतमय है और कान्तिमान् है । फिर भी जब वह सूर्य के मण्डल में पड़ जाता है तो किरण रहित हो जाता है । पराये घर जाकर भला कौन ऐसा है कि जिसकी लघुता न साबित होती हो ॥१४॥

८ चाणक्यनीतिदर्पणः ११३

अलिरयं नलिनीदलमध्यगः कमलिनीमकरन्दमदालसः । विधिवशात्परदेशमुपागतः कुटजपुष्परसं बहु मन्यते ॥१५॥

दो०—वह अलि नलिनी पति मधुप, तेहिरस मद अलसान । परि विदेश विधिवश करै, फूल रसा बहु मान ॥१५॥

यह एक भौंरा है, जो पहले कमलदल के ही बीचमें कमलिनी का वास लेता रहता था संयोगवश वह अब परदेश जा पहुँचा है, वहाँ वह कौरैया के पुष्परस को ही बहुत समझता है ॥१५॥

पीतः क्रुद्धेनतातश्चरणतलहता वल्लभो येन रोषा- दाबाल्याद्विप्रवर्यैः स्ववदनविवरे धार्यते वैरिणी मे । गेहं मे छेदयन्ति प्रतिदिनसमुमाकान्तपूजानिमित्तं तस्मात्खिन्नासदाहंद्विजकुलनिलयंज्ञातयुक्तंत्यजामि

स०--क्रोध से तात पियो चरणन से स्वामी हतो जिन रोषते छाती । बालसे वृद्धभये तक मुख में भारति वैरिणी धारे संघाती ॥ मम वासको पुष्प सदा उन तोड़त शिवजीकी पूजा होत प्रभाति। ताते दुख मान सदैव हरी मैं ब्राह्मण कुलको त्याग चित्लाती ॥ ब्राह्मण अधिकांश दरिद्र दिखाई देते हैं, कवि कहता है कि इस विषय पर किसी प्रश्नोत्तर के समय लक्ष्मीजी भगवान् से कहती हैं—जिसने क्रुद्ध होकर मेरे पिता को पीलिया, मेरे स्वामी को लात से मारा, बाल्यकाल ही से जो रोज ब्राह्मण लोग वैरिणी (सरस्वती)