चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
९४ चाणक्यनीतिदर्पणं।
दोहा—इच्छित सब सुख केहि मिलत, जब सब दैवाधीन यहि ते संतोषहिं शरण, चहैं चतुर कहँ कीन ॥१४॥
अपने मन के अनुसार सुख किसे मिलता है। क्योंकि संसार का सब काम दैव के अधीन है। इसलिये जितना सुख प्राप्त हो जाय, उतने में ही सन्तुष्ट रहो ॥१४॥
यथा धेनुसहस्रेषु वत्सो गच्छति मातरम् । तथा यच्च कृतं कर्म कर्तारमनुगच्छति ॥१५॥
दोहा—जैसे धेनु हजार में, वत्स जाय लखि मात । तैसे ही किन्हें करम, करतहिं के ढिग जात ॥१५॥
जैसे हजारों गौओं में बछड़ा अपनी ही माँ के पास जाता है। उसी तरह प्रत्येक मनुष्य का कर्म ( भाग्य ) अपने स्वामी के ही पास जा पहुँचता है ॥१५॥
अनवस्थितकार्यस्य न जने न वने सुखम् । जनो दहति संसर्गाद्वनं संगविवर्जनात् ॥१६॥
दोहा—अनथिर कारज ते न सुख, जन औ वन दुहुँ माहिं । जन तेहि दाहै, सङ्ग ते, वन असंग ते दाहि ॥१६॥
जिसका कार्य अव्यवस्थित रहता है उसे न समाज में सुख है, न वन में। समाज में वह संसर्ग से दुःखी रहता है तो वन में संसर्ग त्याग से दुखी रहेगा ॥१६॥
यत् खनित्वा खनित्रेण भूतले वारि विन्दति । तथा गुरुगतां विद्यां शुश्रूषुरधिगच्छति ॥१७॥
चाणक्यनीतिदर्पणः ९९
दोहा—जिमि खोदत ही ते मिले, भूतल के मधि वारि ।
तैसेहि सेवा के किये, गुरु विद्या मिलि धारि ॥१७.।
जैसे फावड़े से खोदने पर पृथ्वी से जल निकल आता है । उसी तरह किसी गुरु के पास विद्यमान विद्या उसकी सेवा करने से प्राप्त हो जाती है ॥१७ ॥
कर्मायत्तं फलं पुंसां बुद्धिः कर्मानुसारिणी ।
तथाऽपि सुधियश्चार्या सुविचार्यैव कुर्वते ॥१८॥
दोहा—फलसिधि कर्म अधीन है, बुद्धि कर्म अनुसार ।
तौहू सुमति महान जन, करम करहिं सुविचार ॥१८॥
यद्यपि प्रत्येक मनुष्य को कर्मानुसार ही फल प्राप्त होता है और बुद्धि भी कर्मानुसार ही बनती है । फिर भी बुद्धिमान् लोग अच्छी तरह समझ-बूझ कर ही कोई काम करते हैं ॥१८॥
एकाक्षरप्रदातारं यो गुरुं नाऽभिवन्दते ।
श्वानयोनिशतं भुक्त्वा चांडालेष्वभिजायते ॥१९॥
दोहा—एक अक्षरदातुहु गुरुहि, जो नर वन्दे नाहिं ।
जन्म सैकड़ों श्वान ह्वै, जनै चण्डालन माहिं ॥१९॥
एक अक्षर देनेवाले को भी जो मनुष्य अपना गुरु नहीं मानता तो वह सैकड़ों बार कुत्ते की योनि में रह-रह कर अन्त में चाण्डाल होता है ॥१९॥
| १०० | चाणक्यनीतिदर्पणः |
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युगान्ते प्रचलेन्मेरुः कल्पान्ते सप्त सागराः ।
साधवः प्रतिपन्नार्थान्न चलन्ति कदाचन ॥२०॥
दोहा—सात सिन्धु कल्पान्त चलु, मेरु चलै युग अन्त ।
परे प्रयोजन ते कबहुँ, नहिं चलते हैं सन्त ॥२०॥
युग का अन्त हो जाने पर सुमेरु पर्वत डिग जाता है । कल्प का अन्त होने पर सातो सागर भी चंचल हो उठते हैं, पर सज्जन लोग स्वीकार किये हुये मार्ग से विचलित नहीं होते ॥२०॥
पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि अन्नमापः सुभाषितम् ।
मूढैः पाषाणखण्डेषु रत्नसंख्या विधीयते ॥२१॥
म०छ०--अन्न बारि चारु बोल तीनि रत्न भू अमोल ।
मूढ़ लोग के पषान टूक रत्न के पषान ॥२१ ॥
सच पूछो तो पृथिवी भर में तीन ही रत्न हैं--अन्न, जल और मीठी-मीठी बातें । लेकिन बेवकूफ लोग पत्थर के टुकड़ों को ही रत्न मानते हैं ॥२१॥
इति चाणक्ये त्रयोदशोऽध्यायः ॥१३॥
अथ चतुर्दशोऽध्यायः ॥१४॥
आत्मापराधवृक्षस्य फलान्येतानि देहिनाम् ।
दारिद्र्य-रोग-दुःखानि बन्धनव्यसनानि च ॥१॥
चाणक्यनीतिदर्पणः १०१
म०छ०--निर्धनत्व दुःख बन्ध और विपत्ति सात ।
है स्वकर्म वृक्ष जात ये फलैं धरैक गात ॥१॥
मनुष्य अपने द्वारा पल्लवित अपराध रूपी वृक्ष के ये ही फल फलते हैं--दरिद्रता, रोग, दुःख, बन्धन ( कैद ) और व्यसन ॥१॥
पुनर्वित्तम्पुनर्मित्रं पुनर्भार्या पुनर्मही ।
एतत्सर्वं पुनर्लभ्यं न शरीरं पुनः पुनः ॥२॥
म०छ०--फेरि वित्त फेरि मित्त, फेरि तो धराहु नित्त ।
फेरि फेरि सर्व एह, ये मानुषी मिलै न देह ॥२॥
गया हुआ धन वापस मिल सकता है, रूठा हुआ मित्र भी राजी किया जा सकता है, हाथ से निकली हुई स्त्री भी फिर वापस आसकती है और छीनी हुई जमीन भी फिर मिल सकती है, पर गया हुआ यह शरीर वापस नहीं मिल सकता ॥२॥
बहूनां चैव सत्त्वानां समवायो रिपुञ्जयः ।
वर्षन्धाराधरो मेघस्तृणैरपि निवार्यते ॥३॥
म०छ०--एक ह्वै अनेक लोग वीर्य शत्रु जीत योग ।
मेघ धारि बारि जेत घास ढेर बारि देत ॥३॥
बहुत प्राणियों का सङ्गठित बल शत्रु को परास्त कर देता है, प्रचण्ड वेग के साथ बरसते हुए मेघ को सङ्गठन के बल से क्षुद्र तिनके हरा देते हैं ॥३॥
१०२ चाणक्यनीतिदर्पणः
जले तैलं खले गुह्यं पात्रे दानं मनागपि ।
प्राज्ञे शास्त्रं स्वयं याति विस्तारं वस्तुशक्तितः ॥४॥
म०छ०-थोर तेल वारि माहिं । गुप्तहू खलानि माहिं ।
दान शास्त्र पात्रज्ञानि । ये बड़े स्वभाव आहि ॥४॥
जल में तेल, दुष्ट मनुष्य में कोई गुप्त बात, सुपात्र में थोड़ा भी दान और समझदार मनुष्य के पास शास्त्र, ये थोड़े होते हुए भी पात्र के प्रभाव से तुरन्त फैल जाते हैं ॥४॥
धर्माख्याने श्मशाने च रोगिणां या मतिर्भवेत् ।
सा सर्वदैव तिष्ठेच्चेत्को न मुच्येत बन्धनात् ॥५॥
म०छ०-धर्म वीरता मशान । रोग माहिं जौन ज्ञान ।
जो रहे वही सदाइ । बन्ध को न मुक्त हांइ ॥५॥
कोई धार्मिक आख्यान सुनने पर, श्मशान में और रुग्णावस्था में मनुष्य की जैसी बुद्धि रहती है, वैसी यदि हमेशा रहे तो कौन मनुष्य मोक्षपद न प्राप्त कर ले ? ॥५॥
उत्पन्नपश्चात्तापस्य बुद्धिर्भवति यादृशी ।
तादृशी यदि पूर्वं स्यात्कस्य स्यान्न महोदयः ॥६॥
म०छ०-आदि चूकि अन्त शोक । जो रहे विचारि दोष ।
पूर्वही बनै जो बैस । कौन को मिले न ऐश ॥६॥
कोई बुरा काम करने पर पछतावे के समय मनुष्य की जैसी बुद्धि रहती है, वैसी यदि पहले ही से रहे तो कौन मनुष्य उन्नत न हो जाय ॥६॥
चाणक्यनीतिदर्पणः १०३
दाने तपसि शौर्ये वा विज्ञाने विनये नये । विस्मयो न हि कर्तव्यो बहुरत्ना बसुन्धरा ॥७॥
म०छ०--दान नय विनय नगीच शूरता विज्ञान बीच । कीजिये अचर्ज नाहिं, रत्न ढेर भूमि माहिं ॥७॥
दान, तप, वीरता, विज्ञान और नीति, इनके विषय में कभी किसी को विस्मित होना ही नहीं चाहिये । क्योंकि पृथ्व्री में बहुत से रत्न भरे पड़े हैं ॥७॥
दूरस्थोऽपि न दूरस्थो यो यस्य मनसि स्थितः । यो यस्य हृदये नास्ति समीपस्थोऽपि दूरतः ॥८॥
म०छ०--दूरहू बसै नगीच, जासु जौन चित्त बीच । जो न चित्त जासु पूर । है समीपहूँ सो दूर ॥८॥
जो (मनुष्य) जिसके हृदय में स्थान किये है, वह दूर रहकर भी दूर नहीं है । जो जिसके हृदय में नहीं रहता, वह समीप रहने पर भी दूर है ॥८॥
यस्माच्च प्रियमिच्छेत्तु तस्य ब्रूयात्सदा प्रियम् । व्याधो मृगवधं गन्तुं गीतं गायति सुस्वरम् ॥६॥
म०छ०--जाहिते चहे सुपास, मीठी बोली तासु पास । व्याध मारिबे मृगान, मंत्र गावती सुगान ॥९॥
मनुष्य को चाहिए कि जिस किसी से अपना भला चाहता हो उससे हमेशा मीठी बातें करे । क्योंकि बहेलिया जब हिरन का शिकार करने जाता है तो बड़े मीठे स्वर से गाता है ॥९॥
१०४ | चाणक्यनीतिदर्पणः
अत्यासन्ना विनाशाय दूरस्था न फलप्रदाः ।
सेव्यतां मध्यभागेन राजवह्निगुरुस्त्रियः ॥१०॥
म०छ०--अति पास नाश हेत, दूरहू ते फल न हेत ।
सेवनीय मध्य भाग, गुरु, भूप नारि आग ॥१०॥
राजा, अग्नि, गुरु और स्त्रियाँ--इनके पास अधिक रहने पर विनाश निश्चित है और दूर रहा जाय तो कुछ मतलब नहीं निकलता । इसलिए इन चारों की आराधना ऐसे करे कि न ज्यादा पास रहे न ज्यादा दूर ॥१०॥
अग्निरापः स्त्रियो मूर्खाः सर्पो राजकुलानि च ।
नित्यं यत्नेन सेव्यानि सद्यः प्राणहराणि षट्॥११॥
म०छ०--अग्नि सर्प मूर्ख नारि, राजवंश और वारि ।
यत्न साथ सेवनीय, सद्य ये हरैं छ जीय ॥११॥
आग, पानी, मूर्ख, नारी और राज-परिवार इनकी यत्न के साथ आराधना करै । क्योंकि ये सब तुरन्त प्राण लेने वाले जीव हैं ॥११॥
स जीवति गुणा यस्य यस्य धर्मः स जीवति ।
गुणधर्मविहीनस्य जीवितं निष्प्रयोजनम् ॥१२॥
म०छ०--जीवतो गुणी जो होय, या सुधर्म युक्त जीव ।
धर्म और गुणी न जासु, जीवनो सुव्यर्थ तासु ॥१२॥
जो गुणी है, उसका जीवन सफल है या जो धर्मात्मा है, उसका जन्म सार्थक है । इसके विपरीत गुण और धर्म से विहीन जीवन निष्प्रयोजन है ॥१२॥
चाणक्यनीतिदर्पणः १०५
यदिच्छसि वशीकर्त्तुं जगदेकेन कर्मणा । पुरः पञ्चदशास्येभ्यो गां चरन्तीं निवारय ॥१३॥
मं०छ०—चाहते वशै जो कीन, एक कर्म लोक तीन । पन्द्रहों के तों मुखान, जान तो बहार आन ॥१३॥
यदि तुम केवल एक काम से सारे संसार को अपने वश में करना चाहते हो तो पन्द्रह मुखवाले राक्षस के सामने चरती हुई इन्द्रयरूपी गैयों को उधरसे हटा लो । ये पन्द्रह मुख कौन हैं—आँख, नाक, कान, जीभ और त्वचा ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ । मुख, पाँव, लिंग और गुदा, ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ। रूप, रस, गन्ध शब्द और स्पर्श, ये पाँच ज्ञानेन्द्रियों के विषय हैं ॥१३॥
प्रस्तावसदृशं वाक्यं प्रभावसदृशं प्रियम् । आत्मशक्तिसमं कोपं यो जानाति स पण्डितः॥१४॥
सो०—प्रिय स्वभाव अनुकूल, योग प्रसंगे वचन पुनि । निजबल के समतूल, कोष जान पण्डित सोई ॥१४॥
जो मनुष्य प्रसंगानुसार बात, प्रकृति के अनुकूल प्रेम और अपनी शक्ति के अनुसार क्रोध करना जानता है, वही पंडित है ॥१४॥
एक एव पदार्थस्तु त्रिधा भवति वीक्षितः । कुणपं कामिनी मांसं योगिभिः कामिभिः श्वभिः॥१५॥
सो०—वस्तु एक ही होय, तीनि तरह देखी गई । रति मृत माँसू सोय, कामी योगी कुकुर सो ॥१५॥
एक स्त्री के शरीर को तीन जीव तीन दृष्टि से देखते हैं—योगी
१०६ . चाणक्यनीतिदर्पणः
उसे बदबूदार मुर्दे के रूप में देखते हैं कामी उसे कामिनी समझता है और कुत्ता उसे मांसपिण्ड जानता है ॥१५॥
सुसिद्धमौषधं धर्मं गृहच्छिद्रं च मैथुनम् ।
कुभुक्तं कुश्रुतं चैव मतिमान्न प्रकाशयेत् ॥१६॥
सो०--सिद्धौषध धौ धर्म, मैथुन कुवचन भोजनो ।
अपने घरको मर्म, चतुर नहीं प्रगठित करै ॥१६॥
बुद्धिमान् को चाहिए कि इन बातों को किसी से न जाहिर करे—अच्छी तरह तैयार की हुई औषधि, धर्म, अपने घर का दोष, दूषित भोजन और निंद्य किं वदन्ती बचन ॥१६॥
तावन्मौनेन नीयन्ते कोकिलैश्चैव वासराः ।
यावत्सर्वजनानन्ददायिनी वाक् प्रवर्तते ॥१७॥
सो०- तौलौं मौने ठानि, कोकिलहू दिन काटते ।
जौलौं आनन्द खानि, सब को वाणी होत है ॥१७॥
कोयलें तब तक चुपचाप दिन बिता देती हैं जबतक कि वे सब लोगों के मनको आनन्दित करनेवाली वाणी नहीं बोलती हैं। १७।
धर्मं धनं च धान्यं च गुरोर्वचनमौषधम् ।
सुगृहीतं च कर्त्तव्यमन्यथा तु न जीवति ॥१८॥
सो०--धर्म धान्य धनज्ञानि, गुरु वच औषध पाँच यह ।
धार रक्षण अरु हित जानि, अन्यथा जीवन नाहिं यह ॥१८॥
धर्म, धन, अन्न, गुरु का वचन और औषधि इन वस्तुओं को सावधानी के साथ अपनावे और उनके अनुसार चले । जो ऐसा नहीं करता, वह नहीं जीता है ॥१८॥
चाणक्यनीतिदर्पणः १०७
त्यज दुर्जनसंसर्गं भज साधुसमागमम् । कुरु पुण्यमहोरात्रं स्मर नित्यमनित्यतः ॥१९॥
सो०--तजौ दुष्ट सहवास, भजो साधु सङ्गम रुचिर । करौ पुण्य परकास, हरि सुमिरो जग नित्यहिं ॥१९॥
दुष्टों का साथ छोड़ दो, भले लोगों के समागम में रहो, अपने दिन और रात को पवित्र करके बिताओ और इस अनित्य संसार में नित्य ईश्वर का स्मरण करते रहो ॥१९॥
इति चाणक्ये चतुर्दशोऽध्यायः ॥१४॥
*
अथ पञ्चदशोऽध्यायः ॥१५॥
यस्य चित्तं द्रवीभूतं कृपया सर्वजन्तुषु । तस्य ज्ञानेन मोक्षेण किं जटाभस्मलेपनेः ॥१॥
दोहा--जासु चित्त सब जन्तु पर, गलित दया रस माह । तासु ज्ञान मुक्ति जटा, भस्म लेप कर काह ॥१॥
जिसका चित्त दया के कारण द्रवीभूत हो जाता है तो उसे फिर ज्ञान, मोक्ष, जटाधारण तथा भस्मलेपन की क्या आवश्यकता है ? ॥१॥
एकमेवाक्षरं यस्तु गुरुः शिष्यं प्रबोधयेत् । पृथिव्यां नास्ति तद्द्रव्यं यद् दत्त्वा चानृणी भवेत् ॥२॥
दोहा--एकौ अक्षर जो गुरु, शिष्यहिं देत जनाय । भूमि माहि धन नाहिं वह, जोदे अनृण कहाय ॥२॥
१०८ चाणक्यनीतिदर्पणः
यदि गुरु एक अक्षर भी बोलकर शिष्य को उपदेश दे देता है तो पृथिवी में कोई ऐसा द्रव्य है ही नहीं जिसे देकर उस गुरु से उऋण हुआ जाय ॥२॥
खलानां कण्टकानां च द्विविधैव प्रतिक्रिया ।
उपानद्मुखभङ्गो वा दूरतैव विसर्जनम् ॥३॥
दोहा--खल काँटा इन दुहुन को, दोई अहँ उपाय ।
जूतन ते मुख तोड़ियो, रहिबो दूरी बचाय ॥३॥
दुष्ट मनुष्य और कण्टक, इन दोनों के प्रतिकार के दो ही मार्ग हैं । या तो उनके लिए पनही ( जूते ) का उपयोग किया जाय या उन्हें दूर ही से त्याग दे ॥३॥
कुचैलिनं दन्तमलोपधारिणं
बह्वाशिनंनिष्ठुरभाषिणं च ।
सूर्योदये वाऽस्तमिते शयानं ।
विमुञ्चति श्रीर्यदि चक्रपाणिः ॥४॥
दोहा--वसन दसन राखै मलिन, बहु भोजन कटु बैन ।
सोवै रवि पिछवतु जगत, तजै जो श्री हरि ऐन ॥४॥
मैले कपड़े पहननेवाला, मैले दाँतवाला, भुक्खड़, नीरस बातें करनेवाला और सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय तक सोनेवाला यदि ईश्वर ही हो तो उसे भी लक्ष्मी त्याग देती हैं ॥४॥
त्यजन्ति मित्राणि धनैर्विहीनं
दाराश्च भृत्याश्च सुहृज्जनाश्च ।
चाणक्यनीतिदर्पण। १०९
तं चार्थवन्तं पुनराश्रयन्ते ।
ह्यर्थो हि लोके पुरुषस्य बन्धुः ॥५॥
दोहा--तजहिं तीय हित मीत औ, सेवक धन जब नाहिं ।
धन आये बहुरैं सबै धन वन्धू जग माहिं ॥५॥
निर्धन मित्र को मित्र, स्त्री, सेवक और सगे सम्बन्धी छोड़ देते हैं और वही जब फिर धनी हो जाता है तो वे लोग फिर उसके साथ हो लेते हैं । मतलब यह, संसार में धन ही मनुष्य का बन्धु है ॥५॥
अन्यायोपार्जितं द्रव्यं दश वर्षाणि तिष्ठति ।
प्राप्ते एकादशे वर्षे समूलं च विनश्यति ॥६॥
दोहा--करि अनिति धन जोरेऊ, दशे वर्ष ठहराय ।
ग्यारहवें के लागते, जड़ौ मूलते जाय ॥६॥
अन्याय से कमाया हुआ धन केवल दस वर्ष तक टिकता है, ग्यारहवाँ वर्ष लगने पर वह मूल धन के साथ नष्ट हो जाता है ॥६॥
अयुक्तं स्वामिनो युक्तं युक्तं नीचस्य दूषणम् ।
अमृतं राहवे मृत्युर्विषं शंकरभूषणम् ॥७॥
दोहा--खोटो भल समरथ पँह, भलौ खोट लहि नीच ।
विषौ भयो भूषण शिवहिं, अमृत राहु कँह मीच ॥७॥
अयोग्य कार्य भी यदि कोई प्रभावशाली व्यक्ति कर गुजरे तो वह उसके लिए योग्य हो जाता है और नीच प्रकृति का मनुष्य यदि उत्तम काम भी करता है तो वह उसके करने से
११० चाणक्यनीतिदर्पणः
अयोग्य सावित हो जाता है। जैसे अमृत भी राहु के लिए मृत्यु का कारण बन गया और विष भी शिवजीके कण्ठका शृङ्गार हो गया ॥७॥
तद्भोजनं यद् द्विजभुक्तशेषं
तत्सौहृदं यत्क्रियते परस्मिन्।
सा प्राज्ञता या न करोति पापं
दम्भं विना यः क्रियते स धर्मः ॥८॥
दोहा—द्विज उबरैउ भोजन सोई, पर सो मैत्री सोय।
जेहि न पाप वह चतुरता, धर्म दम्भ बिनुसोय ॥८॥
वही भोजन भोजन है, जो ब्राह्मणों के जीम लेने के बाद बचा हो, वही, प्रेम, प्रेम है जो स्वार्थ वश अपने ही लोगों में न किया जाकर औरों पर भी किया जाय। वही विज्ञता (समझदारी) है कि जिसके प्रभाव से कोई पाप न हो सके और वही धर्म है कि जिसमें आडम्बर न हो ॥८॥
मणिलुण्ठति पादाग्रे काचः शिरसि धार्यते।
क्रयविक्रयवेलायां काचः काचो मणिर्मणिः ॥६॥
दोहा—मणि लोटत रहु पाँव तर, काँच रह्यो शिर नाय।
लेत देत मणिही रहे, काँच काँच रहि जाय ॥९॥
वैसे मणि पैरों तले लुढ़के और काँच माथे पर रखा जाय तो इसमें उन दोनों के विषय में कुछ नहीं कहा जा सकता। पर जब वे दोनों बाजार में बिकने आवेंगे और उनका क्रय-विक्रय होने लगेगा तब काँच-काँच ही रहेगा और मणि मणि ही ॥९॥
चाणक्यनीतिदर्पणः १११
अनन्तशास्त्रं बहुलाश्च विद्याः अल्पं च कालो बहुविघ्नता च । यत्सारभूतं तदुपासनीयं, हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात् ॥१०॥
दोहा—बहुत विघ्न कम काल है, विद्या शास्त्र अपार । जल से जैसे हंस पय, लीजै सार निसार ॥१०॥
शास्त्र अनन्त हैं, बहुत सी विद्यायें हैं, थोड़ा सा समय 'जीवन' है और उसमें बहुत से विघ्न हैं । इसलिये समझदार मनुष्य को उचित है जैसे हंस सबको छोड़कर पानी से दूध केवल लेता है, उसी तरह जो अपने मतलब की बात हो, उसे ले ले बाकी सब छोड़ दे ॥१०॥
दूरागतं पथि श्रान्तं वृथा च गृहमागतम् । अनर्चयित्वा यो भुङ्क्ते स वै चाण्डाल उच्यते ॥११॥
दोहा—दूर देश से राह थकि, बिनु कारज घर आय । तेहि बिनु पूजे खाय जो, चाण्डाल कहलाय ॥११॥
जो दूर से आ रहा हो इन अभ्यागतों की सेवा किये बिना जो भोजन कर लेता है उसे चाण्डाल कहना चाहिए ॥११॥
पठन्ति चतुरो वेदान् धर्मशास्त्राण्यनेक॒शः । आत्मानं नैव जानन्ति दर्वी पाकरसं यथा ॥१२॥
दोहा—पढ़े चारहूँ वेदहुँ, धर्म शास्त्र बहु बाद । आपुहिं जानै नाहिं ज्यों, करिद्धिहिं व्यञ्जन स्वाद ॥१२॥
११२ चाणक्यनीतिदर्पणः
कितने लोग चारो वेद और बहुत से धर्मशास्त्र पढ़ जाते हैं, पर वे आपको नहीं समझ पाते, जैसे कि कलछुल पाक में रहकर भी पाक का स्वाद नहीं जान सकती ॥१२॥
धन्या द्विजमयी नौका विपरीता भवार्णवे ।
तरन्त्यधोगताः सर्वे उपरिस्थाः पतन्त्यधः ॥१३॥
दोहा—भवसागर में धन्य है, उलटी यह द्विज नाव ।
नीचे रहि तर जात सब, ऊपर रहि बुड़ि जाय ॥१३॥
यह द्विजमयी नौका धन्य है, कि जो इस संसाररूपी सागरमें उलटे तौर पर चलती है । जो इससे नीचे (नम्र) रहते हैं, वे तर जाते हैं और जो ऊपर (उद्धत) रहते, वे नीचे चले जाते हैं ॥१३॥
अयममृतनिधानं नायकोऽप्योषधीनाम् ।
अमृतमयशरीरः कान्तियुक्तोऽपि चन्द्रः ॥
भवति विगतरश्मिर्मण्डलं प्राप्य भानोः ।
परसदननिविष्टः को लघुत्वं न याति ॥१४॥
दोहा—सुधा धाम औषधिपति, छवि युत अमीय शरीर ।
तऊ चंद्र रविढिग मलिन, पर घर कौन गम्भीर ॥१४॥
यद्यपि चन्द्रमा अमृत का भण्डार है, ओषधियों का स्वामी है; स्वयं अमृतमय है और कान्तिमान् है । फिर भी जब वह सूर्य के मण्डल में पड़ जाता है तो किरण रहित हो जाता है । पराये घर जाकर भला कौन ऐसा है कि जिसकी लघुता न साबित होती हो ॥१४॥
८ चाणक्यनीतिदर्पणः ११३
अलिरयं नलिनीदलमध्यगः कमलिनीमकरन्दमदालसः । विधिवशात्परदेशमुपागतः कुटजपुष्परसं बहु मन्यते ॥१५॥
दो०—वह अलि नलिनी पति मधुप, तेहिरस मद अलसान । परि विदेश विधिवश करै, फूल रसा बहु मान ॥१५॥
यह एक भौंरा है, जो पहले कमलदल के ही बीचमें कमलिनी का वास लेता रहता था संयोगवश वह अब परदेश जा पहुँचा है, वहाँ वह कौरैया के पुष्परस को ही बहुत समझता है ॥१५॥
पीतः क्रुद्धेनतातश्चरणतलहता वल्लभो येन रोषा- दाबाल्याद्विप्रवर्यैः स्ववदनविवरे धार्यते वैरिणी मे । गेहं मे छेदयन्ति प्रतिदिनसमुमाकान्तपूजानिमित्तं तस्मात्खिन्नासदाहंद्विजकुलनिलयंज्ञातयुक्तंत्यजामि
स०--क्रोध से तात पियो चरणन से स्वामी हतो जिन रोषते छाती । बालसे वृद्धभये तक मुख में भारति वैरिणी धारे संघाती ॥ मम वासको पुष्प सदा उन तोड़त शिवजीकी पूजा होत प्रभाति। ताते दुख मान सदैव हरी मैं ब्राह्मण कुलको त्याग चित्लाती ॥ ब्राह्मण अधिकांश दरिद्र दिखाई देते हैं, कवि कहता है कि इस विषय पर किसी प्रश्नोत्तर के समय लक्ष्मीजी भगवान् से कहती हैं—जिसने क्रुद्ध होकर मेरे पिता को पीलिया, मेरे स्वामी को लात से मारा, बाल्यकाल ही से जो रोज ब्राह्मण लोग वैरिणी (सरस्वती)
११४ चाणक्यनीतिदर्पण।
को अपने मुख विवर में आसन दिये रहते हैं, शिवजी को पूजने के लिये जो रोज मेरा घर (कमल) उजाड़ा करते हैं, इन्हीं कारणों से नाराज होकर हे नाथ ! मैं सदैव ब्राह्मण का घर छोड़े रहती हूँ-वहाँ जाती ही नहीं ॥१६॥
बन्धनानि खलु सन्ति बहूनि प्रेमरज्जुकृतबन्धनमन्यत्। दारुभेदनिपुणोऽपिषण्डङ्घ्रिनिष्क्रियोभवति पंकजकोशे
दोहा-बन्धन बहु तेरे अहें, प्रेमबन्धन कछु और । कठौ काटन में निपुण, बँध्यो कमल महँ भौर ॥१७॥
वैसे तो बहुत से बन्धन हैं, पर प्रेम की डोर का बन्धन कुछ और ही है। काठको काटने में निपुण भ्रमर कमलदल को काटने में असमर्थ होकर उसमें बँध जाता है ॥१७॥
छिन्नोऽपि चन्दनतरुर्न जहाति गन्धं वृद्धोऽपि वारणपतिर्न जहाति लीलाम। यन्त्रार्पितो मधुरतां न जहाति चेक्षुः क्षीणोऽपि न त्यजति शीलगुणान् कुलीनः॥१८॥
दोहा---कटे न चन्दन महक तजु, वृद्ध न खेल गजेश । ऊख न पेरे मधुरता, शील न सकुल कलेश ॥१८॥
काटे जाने पर भी चन्दन का वृक्ष अपनी सुगन्ध नहीं छोड़ता, बूढ़ा हाथी भी खेलवाड़ नहीं छोड़ता, कोल्हू में पेरे जाने पर भी ईख मिठास नहीं छोड़ती, ठीक इसी प्रकार कुलीन पुरुष निर्धन होकर भी अपना शील और गुण नहीं छोड़ता ॥१८॥
चाणक्यनीतिदर्पणः ११५
उर्व्यांकोऽपि महीधरो लघुतरो दोर्भ्यां धृतो लीलया तेन त्वां दिवि भूतले च सततं गोवर्धनी गीयसे । त्वां त्रैलोक्यधरं वहामि कुचयोरग्रेण तद्गण्यते किंवा केशव भाषणेन बहुनापुण्यैर्यशो लभ्यते॥१६॥
स०--कोउभूमिकेमाँहिलघूपर्व्वतकरधार केनामतुम्हारोपऱ्या है । भूतलस्वर्गकेबीच सभीनेजोगिरिधरधारी प्रसिद्ध कियो है । तिहूँ लोक के धारक तुमको धरा कुच अग्र कहो यहको गिनतीहै । ताते बहु कहना हैजो वृथा यशलाभहरे निज-पुण्य मिलती है ।
रुक्मिणी-भगवान् से कहती हैं हे केशव ! आपने एक छोटे से पहाड़ को दोनों हाथों से उठा लिया, इसीलिये स्वर्ग और पृथ्वी दोनों लोकों में गोवर्धनधारी कहे जाने लगे । लेकिन तीनों लोकों को धारण करनेवाले आपको मैं अपने कुचों के अगले भाग से ही उठा लेती हूँ, फिर भी उसकी कोई गिनती नहीं होती । हे नाथ ! बहुत कुछ कहने से कोई प्रयोजन नहीं, यही समझ लीजिये कि बड़े पुण्य से यश प्राप्त होता है ।
इति चाणक्ये पञ्चदशोऽध्यायः
अथ षोडशोऽध्यायः ॥१६॥
न ध्यातं पदमीश्वरस्य विधिवत्संसारविच्छित्तये स्वर्गद्वारकपाटपाटनपटुर्धर्मोऽपि नोपार्जितः नारीपीनपयोधरोरुयुगलं स्वप्नेऽपि नाऽऽलिङ्गितं मातुः केवलमेव यौवनवनच्छेदे कुठारा वयम् ॥१॥
११६ चाणक्यनीतिदर्पणः
क०—कबहूँ ना मैंने हरि पदको ध्यान धरा जो मुक्ति पद दाता शास्त्र बीच में कह्यो है । स्वर्ग के भी द्वारको खोलता है बलसे उस धर्म का भी संचय नहीं ही कियो है । नारिन के पुष्ट कुच स्वप्न में न देखे ऐसो खोटो जन्म हमहीं को आय यह मिल्यो है । माता के यौवन छेदन कुठार भये यही हमरो नाम धरा मंहिं बस तुल्यो है ।
किसी मुमूर्षु बूढ़े का पश्चात्ताप है कि संसार के बन्धन को तोड़ने के लिये न मैंने ईश्वर के चरणों का ध्यान किया, न स्वर्ग के दरवाजे तोड़ने की सामर्थ्य रखनेवाले धर्म का ही उपार्जन किया और न कामिनी के कठोर कुच तथा जाँघ का स्वप्न में भी आलिङ्गन किया। जीवन व्यर्थ ही चला गया । हम अपनी माता के यौवन को काटने के लिए कुल्हाड़े ही बने और कुछ नहीं ॥१॥
जल्पन्ति सार्द्धमन्येन पश्यन्त्यन्यं सविभ्रमाः ।
हृदये चिन्तयन्त्यन्यं न स्त्रीणामेकतो रतिः ॥२॥
दोहा—बोले हैं कोइ और से, चितवत हैं कहिं और ।
मन में चिन्ता अन्य की, न स्त्री रति इक ठौर ॥२॥
स्त्रियाँ बातें दूसरे से करती हैं, नखड़े के साथ देखती हैं, किसी दूसरे की ओर, मन में सोचती हैं किसी और को, स्त्रियों का प्रेम एक जगह रहता ही नहीं है ॥२॥
यो मोहान्मन्यते मूढ़ो रक्तेयं मयि कामिनी ।
स तस्या वशगो भूत्वा नृत्येत् क्रीडाशकुन्तवत् ॥३॥
दोहा--जो मूरख ऐसे गिनत, कामिनी का मोहि ध्यान ।
नाचे वाके बस पर्यो, क्रीड़ा पक्षि समान ॥३॥
चाणक्यनीतिदर्पणः ११७
जो मूर्ख यह सोचता है कि अमुक स्त्री मेरे पर मुग्ध है, वह उसके वशीभूत होकर खिलौने की चिड़िया के समान नाचता रहता है ॥३॥
कोऽर्थान्प्राप्यनगर्वितोविषयिणःकस्याऽपदोऽस्तंगताः स्त्रीभिःकस्यनखंडितंभुविमनःको नाम राज्यप्रियः? कः कालस्य न गोचरत्वमगमत् कोऽर्थी गतो गौरवम्? को वा दुर्जनदुर्गुणेषु पतितः क्षेमेण यातः पथि?॥४॥
स०-धनसे किसको नहिं गर्व भयो किसकामकि दुःख समूहनसा । किसके मन खण्डित नाहिं किए जग काहि न राजहिं प्यारकसा । को काल के गाल में नाहिं पर्यो को याचक गौरव मानलहा । दुर्जन के वश में पड़के सुख मारग माहिं जा कौन घमा ।
धन प्राप्त कर किसको गर्व नहीं हुआ ? संसार में कौन ऐसा विषयी पुरुष है कि जिसकी विपत्तियाँ नष्ट हो गयी हैं, कौन ऐसा है जिसका मन स्त्रियों के द्वारा खण्डित न हो गया हो, कौन ऐसा है जो राजा का प्रिय है, कौन ऐसा है जो काल की दृष्टि से बच गया है, कौन ऐसा मनुष्य है जो किसी के यहाँ माँगने के लिए जाकर भी गौरव को प्राप्त हुआ हो, और कौन ऐसा है कि जो दुष्टों की दुष्टता में फँसकर भी कुशलपूर्वक दुनियाँ का रास्ता तै कर गया है ॥४॥
न निर्मिता केन न दृष्टपूर्वा न श्रूयते हेममयी कुरंगी । तथाऽपितृष्णारघुनंदनस्यविनाशकालेविपरीतबुद्धिः।
दोहा-रचो न देख्यो नहिं सुन्यो, नहीं कनक मृग गात । तऊ राम तृष्णा स्वमति, नाशकाल फिरि जात ॥५॥