चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६ चाणक्यनीतिदर्पण।
प्रकार के मनुष्यों से जो मनुष्य मित्रता करता है, उसका बहुत जल्दी विनाश हो जाता है ॥ १९ ॥
समाने शोभते प्रीतिः राज्ञि सेवा च शोभते । वाणिज्यंव्यवहारेषु स्त्री दिव्या शोभते गृहे ॥२०॥
दोहा--सम सों सोहत मित्रता, नृप सेवा सुसोहात । बनियाई व्यवहार में, सुन्दरि भवन सुहात ॥२०॥
बराबरवाले के साथ मित्रता भली मालूम होती है । राजा की सेवा अच्छी लगती है व्यवहार में बनियापन भला लगता है और घर के अन्दर स्त्री भली मालूम होती है ॥ २० ॥
इति चाणक्य नीतिदर्पणे द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
अथ तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
कस्य दोषः कुले नास्ति व्याधिना के न पीडितः । व्यसनं केन संप्राप्तं कस्य सौख्यंनिरन्तरम् ॥१॥
दोहा—केहि कुल में दूषण नहीं, व्याधि न काहि सताय । कष्ट न भोग्यो कौन जन, सुखी सदा कोउ नाय ॥१॥
किसके कुल नहीं है ? कितने ऐसे प्राणी हैं जो किसी प्रकार के रोगी नहीं हैं ? कौन ऐसा जीव है कि हमेशा जिसे सुख ही सुख मिल रहा है ? ॥ १ ॥