चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२ चाणक्यनीतिदर्पणः १७
आचारःकुलमाख्याति देशमाख्याति भाषणम् । सम्भ्रमः स्नेहमाख्यातिवपुराख्याति भोजनम् ॥२॥
दोहा—महत कुलहिं आचार भल, भाषन देश बताय । आदर प्रीति जनावहि, भोजन देहू मुटाय ॥२॥
मनुष्य का आचरण उसके कुल को बता देता है, उसका भाषण देश का पता दे देता है, उसका आदर भाव प्रेम का परिचय दे देता है और शरीर भोजनका हाल कह देता है ॥२॥
सत्कुले योजयेत्कन्यां पुत्रं विद्यासु योजयेत् । व्यसने योजयेच्छत्रुं मित्रं धर्मे नियोजयेत् ॥३॥
दोहा—कन्या व्याहिय उच्च कुल, पुत्रहिं शास्त्र पढ़ाय । शत्रुहिं दुख दीजै सदा, मित्रहिं धर्म सिखाय ॥३॥
मनुष्य का कर्त्तव्य है कि अपनी कन्या किसी अच्छे खान-दान वाले को दे । पुत्र को विद्याभ्यास में लगा दे । शत्रु को विपत्ति में फँसा दे और मित्र को धर्मकार्य में लगा दे ॥३॥
दुर्जनस्य च सर्पस्य वरं सर्पो न दुर्जनः । सर्पो दंशति काले तु दुर्जनस्तु पदे पदे ॥४॥
दोहा—खलहु सर्प इन दुहुन में, भलो सर्प खल नाहिं । सर्प दशत है काल में, खलजन पद पद माहिं ॥ ४॥
दुर्जन और साँप इन दोनों में, दुर्जन की अपेक्षा साँप कहीं अच्छा है । क्योंकि साँप समय पाकर एक ही बार काटता है और दुर्जन पद पद पर काटता रहता है ॥ ४ ॥