चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१८ | चाणक्यनीतिदर्पणः
एतदर्थं कुलीनानां नृपाः कुर्वन्ति संग्रहम् ।
आदिमध्यावसानेषु न त्यजन्ति च ते नृपम् ॥५॥
दोहा—भूप कुलीनन्ह को कर, संग्रह याही हेत ।
आदि मध्य और अन्त में, नृपहि न ते तजि देत ॥ ५ ॥
राजा लोग कुलीन पुरुषों को अपने पास इसलिए रखते हैं कि जो आदि मध्य और अन्त किसी समय भी राजा को नहीं छोड़ते ॥ ५ ॥
प्रलये भिन्नमर्यादा भवन्ति किल सागराः ।
सागरा भेदमिच्छन्ति प्रलयेऽपि न साधवः ॥६॥
दोहा—मर्यादा सागर तजे, प्रलय होन के काल ।
उत साधू छोड़े नहीं, सदा आपनी चाल ॥ ६ ॥
समुद्र तो प्रलयकाल में अपनी मर्यादा भी भंग कर देते हैं ( उमड़ कर सारे संसार को डुबो देते हैं ) । पर सज्जन लोग प्रलयकाल में भी अपनी मर्यादा का उल्लंघन नहीं करते हैं ॥६॥
मूर्खस्तु परिहर्त्तव्यः प्रत्यक्षो द्विपदः पशुः ।
भिद्यते वाक्यशूलेन अदृश्यं कण्टकं यथा ॥७॥
दोहा—मूरख को तजि दीजिये, प्रकट द्विपद पशु जान ।
वचन शल्यते वेधहीं, अङ्गहिं काँट समान ॥ ७ ॥
मूर्ख को दो पैरवाला पशु समझ कर उसे त्याग ही देना चाहिए । क्योंकि यह समय-समय पर अपने वाक्यरूपी शूल