चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचाणक्यनीतिदर्पणः १९
से उसी तरह वेधता है जैसे न दिखायी पड़ता हुआ काँटा चुभ जाता है ॥७॥
रूपयौवनसम्पन्ना विशालकुलसम्भवाः ।
विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः ॥८॥
दोहा—संयुत जीवन रूपते, कहिये बड़े कुलीन ।
विद्या बिन शोभत नहीं, पुहुप गंध ते हीन ॥८॥
रूप और यौवन से युक्त, विशाल कुल में उत्पन्न होता हुआ भी विद्याविहीन मनुष्य उसी प्रकार अच्छा नहीं लगता, जैसे सुगन्धित रहित पलास का फूल ॥८॥
कोकिलानां स्वरो रूपं नारीरूपं पतिव्रतम् ।
विद्यारूपं कुरूपाणां क्षमा रूपं तपस्विनाम् ॥९॥
दोहा—रूप कोकिला रव तियन, पतिव्रत रूप अनूप ।
विद्यारूप कुरूप को, क्षमा तपस्वी रूप ॥९॥
कोयल का सौन्दर्य उसकी बोली, स्त्री का सौन्दर्य है उसका पातिव्रत । कुरूप का सौन्दर्य है उसकी विद्या और तपस्वियों का सौन्दर्य है उनकी क्षमाशक्ति ॥९॥
त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् ।
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ॥१०॥
दोहा—कुलहित त्यागिय एककूँ, गृहहु छाड़ि कुल ग्राम ।
जनपद हित ग्रामहि तजिय, तनहित अवनि तमाम ॥१०॥