चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 37, कुल 132 में से
संदर्भ में पढ़ेंचाणक्यनीतिदर्पणः ३५
अन्यथा वेदपाण्डित्यं शास्त्रमाचारमन्यथा ।
अन्यथा वदता शांतं लोकाःक्लिश्यन्तिचाऽन्यथा १०
दोहा—वेद शास्त्र आचार औ, शास्त्रहूँ और प्रकार ।
जो कहते लहते वृथा, लोग कलेश अपार ॥१०॥
वेद को, पाण्डित्य को, शास्त्र को, सदाचार को, और शान्त मनुष्य को जो लोग बदनाम करना चाहत हैं, वे व्यर्थ कष्ट करते हैं ॥१०॥
दारिद्र्यनाशनं दानं शीलं दुर्गतिनाशनम् ।
अज्ञाननाशिनी प्रज्ञा भावना भयनाशिनी ॥११॥
सोरठा—दारिद नाशन दान, शील दुर्गतिहिं नाशयित ।
बुद्धि नाश अज्ञान, भय नशात है भावना ॥११॥
दान दरिद्रता को नष्ट करता है, शील दुरवस्था को नष्ट कर देता है, बुद्धि अज्ञान को नष्ट कर देती है और विचार भय को नष्ट कर दिया करता है ॥११॥
नास्ति कामसमो व्याधिर्नास्ति मोहसमो रिपुः ।
नास्ति कोपसमो वह्निर्नास्ति ज्ञानात्परं सुखम् ॥१२।
सोरठा—व्याधि न काम समान, रिपु नहिं दूजो मोह सम ।
अग्नि कोप से आन, नहीं ज्ञान से सुख परे ॥१२॥
काम के समान कोई रोग नहीं है, मोह (अज्ञान) के समान कोई शत्रु नहीं है, क्रोध के समान और कोई अग्नि नहीं है और ज्ञान से बढ़कर और कोई सुख नहीं है ॥१२॥