चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३६ चाणक्यनीतिदर्पणः
जन्ममृत्युं हि यात्येको भुनक्त्येकः शुभाशुभम् । नरकेषु पतत्येक एको याति परां गतिम् ॥१३॥
सरोठा—जन्म मृत्यु लहु एक, भोगै हैं इक शुभ अशुभ । नरक जात है एक, लहत एक ही मुक्तिपद ॥१३॥
संसार के मनुष्यों में से एक मनुष्य जन्म मरण के चक्कर में पड़ता है, एक अपने शुभाशुभ कर्मों का फल भोगता है, एक नरक में जा गिरता है और एक परम पद को प्राप्त कर लेता है ॥१३॥
तृणं ब्रह्मविदः स्वर्गस्तृणं शूरस्य जीवितम् । जिताक्षस्य तृणं नारी निःस्पृहस्य तृणं जगत् ॥१४॥
दोहा—ब्रह्मज्ञानिहिं स्वर्ग तृन, जित इन्द्रिय तृण नार । शूरहिं तृण है जीवनो, निस्पृह कहँ संसार ॥१४॥
ब्रह्मज्ञानी के लिये स्वर्ग तिनके के समान है । बहादुर के लिए जीवन तृण के समान है जितेन्द्रिय को नारी और निस्पृह के लिए सारा संसार तृण के समान है ॥१४॥
विद्या मित्रं प्रवासेषु भार्या मित्रं गृहेषु च । व्याधितस्यौषधं मित्रं धर्मो मित्रं मृतस्य च ॥१५॥
दोहा—विद्या मित्र विदेश में, घर तिय मीत सुप्रीत । रोगिहिं औषध अरु मरे, धर्म होत ह मीत ॥१५॥
परदेश में विद्या मित्र है, घर में स्त्री मित्र है । रोगी को