चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३८ चाणक्यनीतिदर्पणः
दरिद्र मनुष्य धन चाहते हैं। चौपाये वाणी चाहते हैं। मनुष्य स्वर्ग चाहते हैं और देवता लोग मोक्ष चाहते हैं॥१८॥
सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रविः।
सत्येन वाति वायुश्च सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम् ॥१९॥
दोहा—सत्यहि ते रवि तपत हैं, सत्यहिं पर भुवभार।
चले पवनहू सत्य ते, सत्यहिं सब आधार ॥१९॥
सत्य के आधार पर पृथ्वी रुकी है। सत्य के सहारे सूर्य भगवान् संसार को गर्मी पहुँचाते हैं। सत्य के ही बल पर वायु बहता है। कहने का मतलब यह कि सब कुछ सत्यमें ही है ॥१९॥
चला लक्ष्मीश्चलाः प्राणाश्चले जीवितमन्दिरे।
चलाऽचले च संसारे धर्म एको हि निश्चलः ॥२०॥
दोहा—चल लक्ष्मी औ प्राणहू, और जीविका धाम।
यह चलाचल जगत में, अचल धर्म अभिराम ॥२०॥
लक्ष्मी चंचल है, प्राण भी चंचल ही है, जीवन तथा घर द्वार भी चंचल है और कहाँ तक कहें यह सारा संसार चञ्चल है, बस धर्म केवल अचल और अटल है ॥२०॥
नराणां नापितो धूर्तः पक्षिणां चैव वायसः।
चतुष्पदां शृगालस्तु स्त्रीणां धूर्ता च मालिनी॥२१॥
दोहा—नर में नाई धूर्त है, मालिन नारि लखाहि।
चौपायन में स्यार है, वायस पक्षिन माहिं ॥२१॥