भारतकोश
चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

Chanakya Niti Darpan Hindi

आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा

स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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चाणक्यनीतिदर्पणः ४७

सुश्रान्तोऽपि वहेत भारं शीतोष्णं न च पश्यति ।
सन्तुष्टश्चरते नित्यं त्रीणि शिक्षेच्च गर्दभात् ॥२१॥
दोहा--भार बहुत ताकत नहीं, शीत उष्ण सम जाहि ।
हिये अधिक सन्तोष गुन, गरदभ तीनि गहाहि । २१।
भरपूर थकावट रहनेपर भी बोझा ढोना, सर्दी-गर्मी की परवाह न करना, सदा सन्तोष रखकर जीवनयापन करना, ये तीन गुण गधा से सीखना चाहिए ॥२१॥

एतान् विंशतिगुणानाचरिष्यति मानवः ।
कार्यावस्थासु सर्वासु अजेयः स भविष्यति ॥२२॥
दोहा--विंशति सीख विचारि यह, जो नर उर धारंत ।
सो सब नर जीवित अवनि, जय यश जगत लहंत ॥२२॥
जो मनुष्य ऊपर गिनाये बीसों गुणों को अपना लेगा और उसके अनुसार चलेगा, वह सभी कार्य में अजेय रहेगा ॥२२॥

इति चाणक्ये षष्ठोऽध्यायः ॥६॥

—:०:—

अथ सप्तमोऽध्यायः ॥७॥

अर्थनाशं मनस्तापं गृहिणीचरितानि च ।
नीचवाक्यं चाऽपमानं मतिमान्न प्रकाशयेत् ॥१॥
दोहा--अरथ नाश मन ताप अरु, दार चरित घर माहिं ।
वंचनता अपमान निज, सुधी प्रकाशत नाहिं ॥१॥