चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 48, कुल 132 में से
संदर्भ में पढ़ें४६ चाणक्यनीतिदर्पणः
प्रत्युत्थानञ्च युद्धञ्च संविभागञ्च बन्धुषु । स्वयमाक्रम्य भुक्तञ्च शिक्षेच्चत्वारि कुक्कुटात् ॥१८॥
दोहा—प्रथम उठै रण में जुरै, बन्धु विभागहिं देत ।
स्वोपार्जित भोजन करै, कुक्कुट गुन चहुँ लेत ॥१८॥
ठीक समय से जागना, लड़ना, बन्धुओंके हिस्से का बटवारा और छीन-झपट कर भोजन कर लेना, ये चार बातें मुर्गे से सीखे ॥१८॥
गूढमैथुनचारित्वं काले काले च संग्रहम् ।
अप्रमत्तमविश्वासं पञ्च शिक्षेच्च वायसात् ॥१९॥
दोहा—अधिक ढीठ अरु गूढ़ रति, समय सुआलय सञ्च ।
नहिं विश्वास प्रमाद जेहि, गहु वायस गुन पञ्च ॥१९॥
एकान्त में स्त्री का संग करना, समय-समय पर कुछ संग्रह करते-रहना, हमेशा चौकन्ना रहना और किसी पर विश्वास न करना, ढीठ रहना, ये पाँच गुण कौए से सीखना चाहिए ॥१९॥
बह्वाशी स्वल्पसन्तुष्टः सुनिद्रो लघुचेतनः ।
स्वामिभक्तश्च शूरश्च षडेते श्वानतो गुणाः ॥२०॥
दोहा—बहुभुख थोरेहु तोष अति, सोवहि शीघ्र जगात ।
स्वामिभक्त बड़ वीरता, षट्गुन श्वानन हात ॥२०॥
अधिक भूख रहते भी थोड़े में सन्तुष्ट रहना, सोते समय होश ठीक रखना, हल्की नींद सोना, स्वामिभक्ति और बहादुरी—ये गुण कुत्ते से सीखना चाहिये ॥२०॥