चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचाणक्यनीतिदर्पणः ४५
सिंहादेकं बकादेकं शिक्षेच्चत्वारि कुक्कुटात् । वायसात्पञ्च शिक्षेच्चषट् शुनस्त्रीणिगर्दभात् ॥१५॥ दोहा—एक सिंह एक बकन से, अरु मुर्गा तें चारि । काक पंच षट् स्वान तें, गर्दभ तें गुन तारि ॥१५॥ सिंह से एक गुण, बगुले से एक गुण, मुर्गे से चार गुण, कौए से पाँच गुण, कुत्ते से छ गुण और गधे से तीन गुण ग्रहण करना चाहिए ॥१५॥
प्रभूतं कार्यमपि वा तन्नरः कर्तुमिच्छति । सर्वारम्भेण तत्कार्यं सिंहादेकं प्रचक्षते ॥१६॥ दोहा—अति उन्नत कारज कछू, किय चाहत नर कोय । करै अनन्त प्रयत्न तें, गहत सिंह गुण सोय ॥१६॥ मनुष्य कितना ही बड़ा काम क्यों न करना चाहता हो, उसे चाहिए कि सारी शक्ति लगा कर वह काम करे । यह गुण सिंह से ले ॥१६॥
इन्द्रियाणि च संयम्य बकवत् पण्डितो नरः । देशकालबलं ज्ञात्वा सर्वकार्याणि साधयेत् ॥१७॥ दोहा—देशकाल बल जानिके, गहि इन्द्रिय को ग्राम । बस जैसे पण्डित पुरुष, कारज करहिं समान ॥१७॥ समझदार मनुष्य को चाहिए कि वह बगुले की तरह चारों ओर से इन्द्रियों को समेटकर और देश काल के अनुसार अपना बल देख कर सब कार्य साधे ॥१७॥