भारतकोश
चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

Chanakya Niti Darpan Hindi

आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा

स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished132 पृष्ठ

पृष्ठ 46, कुल 132 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 46

४४ चाणक्यनीतिदर्पणः

वरं न राज्यं न कुराजराज्यं वरं न मित्रं न कुमित्रमित्रम् । वरं न शिष्यो न कुशिष्यशिष्यो वरं न दारा न कुदारदाराः ॥१३॥

दोहा—नहिं कुराज बिनु राज भल, त्यों कुमीतहू मीत । शिष्य बिना बरु है भलो, त्यों कुदार कहु नीत ॥१३॥

राज्य ही न हो तो अच्छा, पर कुराज्य अच्छा नहीं । मित्र ही न हो तो अच्छा, पर कुमित्र होना ठीक नहीं । शिष्य ही न हो तो अच्छा, पर कुशिष्य का होना अच्छा नहीं । स्त्री ही न हो तो ठीक है, पर खराब स्त्री का होना अच्छा नहीं ॥१३॥

कुराजराज्येन कुतः प्रजासुखं कुमित्रमित्रेण कुतोऽभिनिर्वृतिः । कुदारदारैश्च कुतो गृहे रतिः कुशिष्यमध्यापयतः कुतो यशः ॥१४ ।

दोहा—सुख कहँ प्रजा कुराजतें, मित्र कुमित्र न प्रेय । कहँ कुदारतें गेह सुख, कहँ कुशिष्य यश देय ॥१४॥

बदमाश राजा के राज्य में प्रजा को सुख क्योंकर मिल सकता है । दुष्ट मित्र से भला हृदय कब आनन्दित होगा । दुष्ट स्त्री के रहने पर घर कैसे अच्छा लगेगा और दुष्ट शिष्य को पढ़ा कर यश क्यों कर प्राप्त हो सकेगा ॥१४॥