चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचाणक्यनीतिदर्पणः ४३
जीव स्वयं कर्म करता है और स्वयं उसका शुभाशुभ फल भोगता है ! वह स्वयं संसार में चक्कर खाता है और समय पाकर स्वयं छुटकारा भी पा जाता है ॥९॥
राजा राष्ट्रकृतं पापं राज्ञः पापं पुरोहितः ।
भर्त्ता च स्त्रीकृतं पापं शिष्यपापं गुरुस्तथा ॥१०॥
दोहा—प्रजापाप नृप भोगियत, प्रोइत नृप को पाप ।
तिय पातक पति शिष्य को, गुरु भोगत है आप ॥१०॥
राज्य के पाप को राजा, राजाका पाप पुरोहित, स्त्रीका पाप पति और शिष्य के द्वारा किये हुये पाप को गुरु भोगता है ॥१०॥
ऋणकर्ता पिता शत्रु माता च व्यभिचारिणी ।
भार्या रूपवती शत्रुः पुत्रः शत्रुरपण्डितः ॥११॥
दोहा—ऋणकर्ता पितु शत्रु, पर-पुरुषगाँमिनि मात ।
रूपवती तिय शत्रु है, पुत्र अपंडित जात ॥११॥
ऋण करने वाले पिता, व्यभिचारिणी माता, रूपवती स्त्री और मूर्ख पुत्र, ये मानवजातिके शत्रु हैं ॥११॥
लुब्धमर्थेन गृह्णीयात् स्तब्धमञ्जलिकर्मणा ।
मूर्खं छन्दानुवृत्त्या च यथार्थत्वेन पण्डितम् ॥१२॥
दोहा—धनसे लोभी वश करै, गर्विहिं जोरि स्वपान ।
मूरख के अनुसारि चलि, बुध जन सत्यकहान ॥१२॥
लालचीको धनसे, घमण्डी को हाथ जोड़कर, मूर्ख को उसके मनवाली करकेऔर यथार्थ बात से पण्डित को वश में करें ॥१२॥