भारतकोश
चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

Chanakya Niti Darpan Hindi

आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा

स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished132 पृष्ठ

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४२ चाणक्यनीतिदर्पणः

जिस तरह की बुद्धि होती है, वैसा ही कार्य होता है और जैसा होनहार होता है, सहायक भी उसी तरह के मिल जाते हैं ॥६॥

कालः पचति भूतानि कालः संहरते प्रजाः ।
कालः सुप्तेषु जागर्ति कालो हि दुरतिक्रमः ॥७॥
दोहा—काल पचावत जीव सब, करत प्रजन संहार ।
सबके सोवत जांगियतु, काल टरै नहिं टार ॥७॥
काल सब प्राणियों को हजम किए जाता है । काल प्रजा का संहार करता है, लोगों के सो जाने पर भी वह जागता रहता है । तात्पर्य यह कि काल को कोई टाल नहीं सकता ॥७॥

नैव पश्यति जन्मांधः कामान्धो नैव पश्यति ।
मदोन्मत्ता न पश्यन्ति अर्थी दोषं न पश्यति ॥८॥
दोहा—जन्म अन्ध देखै नहीं, काम अन्ध नहिं जान ।
तैसेई मद अन्ध है, अर्थी दोष न मान ॥८॥
न जन्म का अन्धा देखता है, न कामान्ध कुछ देख पाता है और न उन्मत्त पुरुष ही कुछ देख पाता है । उसी तरह स्वार्थी मनुष्य किसी बात में दोष नहीं देख पाता ॥८॥

स्वयं कर्म करोत्यात्मा स्वयं तत्फलमश्नुते ।
स्वयं भ्रमति संसारे स्वयं तस्माद्विमुच्यते ॥९॥
दोहा—जीव कर्म आपै करै भोगत फलहू आप ।
आप भ्रमत संसार में, मुक्ति लहत है आप ॥९॥