भारतकोश
चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

Chanakya Niti Darpan Hindi

आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा

स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished132 पृष्ठ

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४ चाणक्यनीतिदर्पणः ४९

दोहा--तीन ठौर सन्तोष धर, तिय भोजन धन माहिं ।
दानन में अध्ययन में, तप में कीजे नाहिं ॥४॥

तीन बातों में सन्तोष धारण करना चाहिए । जैसे—अपनी स्त्री में, भोजनमें और धनमें । इसी प्रकार तीन बातोंमें कभी भी सन्तुष्ट न होना चाहिए । अध्ययनमें, जप में और दान में ॥४॥

विप्रयोर्विप्राग्नयोश्च दम्पत्योः स्वामिभृत्ययोः ।
अन्तरेण न गन्तव्यं हलस्य वृषभस्य च ॥५॥

दोहा--विप्र विप्र अरु नारि नर, सेवक स्वामिहिं अन्त ।
हल औ बैल के मध्यते, नहिं जावे सुखवन्त ॥५॥

दो ब्राह्मणों के बीच में से, ब्राह्मण और अग्नि के बीच से, स्वामी और सेवक के बीच से, स्त्री-पुरुष के बीच से और हल तथा बैल के बीच से नहीं निकलना चाहिए ॥५॥

पादाभ्यां न स्पृशेदग्निं गुरुं ब्राह्मणमेव च ।
नैव गां च कुमारीं च वृद्धं च न शिशुं तथा ॥६॥

दोहा--अनल विप्र गुरु धेनु पुनि, कन्या कुँआरी देत ।
बालक के अरु वृद्ध के, पग न लगावहु येत ॥६॥

अग्नि, गुरु, ब्राह्मण, गौ, कुमारी कन्या, वृद्ध और बालक इनको कभी पैरों से न छुए ॥६॥

हस्ती हस्तसहस्रेण शतहस्तेन वाजिनः ।
शृङ्गिणो दशहस्तेन देशत्यागेन दुर्जनः ॥७॥

दोहा--हस्ती हाथ हजार तज, शत हाथ से वाजि ।
शृङ्ग सहित तेहि हाथ दश, दुष्ट देश तज आजि ॥७॥