भारतकोश
चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

Chanakya Niti Darpan Hindi

आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा

स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished132 पृष्ठ

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४ चाणक्यनीतिदर्पणः

दोहा—मैं सोइ अब बरनन करूँ, अति हितकारक अङ्ग । जाके जानत होहिं जन, सबही विधि सर्वज्ञ ॥ ३ ॥

लोगों की भलाई के लिए मैं वह बात बताऊँगा कि जिसे समझ लेने से मनुष्य सर्वज्ञ हो जाता है ॥ ३ ॥

मूर्खशिष्योपदेशेन दुष्टास्त्रीभरणेन च ।
दुःखिते सम्प्रयोगेण पण्डितोऽप्यवसीदति ॥ ४ ॥

दोहा--उपदेशत शिपमूढ़ कहँ, व्यभिचारिणि ढिग वास ।
अरि को करत विश्वास उर, विदुषहु लहत विनास ॥४॥

मूर्खशिष्य को उपदेश देनेसे, कर्कशा स्त्री का भरण-पोषण करने से और दुखियों का सम्पर्क रखने से समझदार मनुष्य को भी दुःखी होना पड़ता है ॥ ४ ॥

दुष्टाभार्या शठं मित्रं भृत्यश्चोत्तरदायकः ।
ससर्पे च गृहे वासो मृत्युरेव न संशयः ॥ ५ ॥

दोहा—भामिनि दुष्टा मित्र शठ, प्रति उत्तरदा भृत्य ।
अहि युत बसत अगार में, सब विधि मरिबो सत्य ॥५॥

जिस मनुष्य की स्त्री दुष्टा है, नौकर उत्तर देनेवाला (मुँह लगा) है और जिस घर में साँप रहता है उस घरमें जो रह रहा है तो निश्चय है कि किसी न किसी रोज उसकी मौत होगी ही ॥५॥

आपदर्थे धनं रक्षेद्दारान् रक्षेद्धनैरपि ।
आत्मानं सततं रक्षेद्दारैरपि धनैरपि ॥ ६ ॥