भारतकोश
चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

Chanakya Niti Darpan Hindi

आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा

स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished132 पृष्ठ

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चाणक्यनीतिदर्पणः ५

दोहा—धन गहि राखहु विपति हित, धनं ते वनिता धीर ।
तजि वनिता धनकूँ तुरत, सबते राख शरीर ॥ ६ ॥
आपत्तिकाल के लिए धनको और धन से भी बढ़कर स्त्री की रक्षा करनी चाहिये । किन्तु स्त्री और धन से भी बढ़कर अपनी रक्षा करनी उचित है ॥ ६ ॥

आपदर्थे धनं रक्षेच्छ्रीमंतश्च किमापदः ।
काचिच्चलिता लक्ष्मीः संचितोऽपिविनश्यति ॥ ७ ॥
दोहा—आपद् हित धन रखिये, धनिहिं आपदा कौन ।
संचितहूं नशि जात है, जो लक्ष्मी करु गौन ॥ ७ ॥
आपत्ति से बचने के लिए धन की रक्षा करनी चाहिये । इस पर यह प्रश्न होता है कि श्रीमान् के पास आपत्ति आयेगी ही क्यों ? उत्तर देते हैं कि कोई ऐसा समय भी आ जाता है, जब लक्ष्मी रानी भी चल देती हैं । फिर प्रश्न होता है कि लक्ष्मी के चले जानेपर जो कुछ बचा बचाया धन है, वह भी चला जायगा ही ॥ ७ ॥

यस्मिन् देशे न सम्मानो न वृत्तिर्न च बान्धवः ।
न च विद्यागमोऽप्यस्ति वासस्तत्र न कारयेत् ॥ ८ ॥
दोहा—जहाँ न आदर जीविका, नहिं प्रिय बन्धु निवास ।
नहिं विद्या जिस देश में, करहु न दिन इक वास ॥ ८ ॥
जिस देश में न सम्मान हो, न रोजी हो, न कोई भाई-बन्धु हो और न विद्या का ही आगम हो, वहाँ निवास नहीं करना चाहिये ॥ ८ ॥