भारतकोश
चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

Chanakya Niti Darpan Hindi

आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा

स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished132 पृष्ठ

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५ चाणक्यनीतिदर्पणः ६५

दोहा—अर्थहेत वेदहिं पढ़े, खाय शूद्र को धान ।
ते द्विज क्या कर सकत हैं, बिन विष व्याल समान ॥८॥
जिन्होंने धनके लिए विद्या पढ़ी है और शूद्र का अन्न खाते हैं, ऐसे विषहीन साँप के समान ब्राह्मण क्या कर सकेंगे ॥८॥

यस्मिन् रुष्टे भयं नास्ति तुष्टे नैव धनागमः ।
निग्रहाऽनुग्रहो नास्ति स रुष्टः किं करिष्यति ॥६॥

दोहा—रुष्ट भये भय तुष्ट में, नहीं धनागम होय ।
दण्ड सहाय न करि सकै, का रिसाय करु सोय ॥९॥
जिसके नाराज होने पर कोई डर नहीं है, प्रसन्न होने पर कुछ आमदनी नहीं हो सकती । न वह दे सकता और न कृपा ही कर सकता हो तो उसके रुष्ट होने से क्या होगा ? ॥९॥

निर्विषेणापि सर्पेण कर्तव्या महती फणा ।
विषमस्तु न वाप्यस्तु घटाटोपो भयङ्करः ॥१०॥

दोहा—बिन विषहू के साँप सो, चाहिय फने बढ़ाय ।
होउ नहीं या होउ विष, घटाटोप भयदाय ॥१०॥
विष विहीन सर्प को भी चाहिये कि वह खूब लम्बी चौड़ी फन फटकारे । विष हो या न हो, पर आडम्बर होना ह चाहिये ॥१०॥

प्रातर्धूतप्रसंगेन मध्याह्ने स्त्रीप्रसंगतः ।
रात्रौ चौरप्रसंगेन कालो गच्छति धीमताम् ॥११॥

दोहा—प्रातः द्यूत प्रसंग से, मध्य स्त्री परसंग ।
सायं चोर प्रसंग कह, काल कहे सब अङ्ग ॥११॥