चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 66, कुल 132 में से
संदर्भ में पढ़ें६४ चाणक्यनीतिदर्पणः
जानाति यो द्विजवरः स कथं न विद्वान् ॥५॥
**दोहा—**दूर वचन गति रंग नहिं, नभ न आदि कहुँ कोय ।
शशि रवि ग्रहण बखानु जो, नहिं न विदुष किमि होय ॥५॥
आकाश में न कोई दूत जा सकता है, न बातचीत ही हो सकती है, न पहले से किसी ने बता रखा है, न किसी से भेंट ही होती है, ऐसी परिस्थिति में आकाशचारी सूर्य, चन्द्रमा का ग्रहण समय जो पण्डित जानते हैं, वे क्यों कर विद्वान् न माने जायें ? ॥५॥
विद्यार्थी सेवकः पान्थः क्षुधार्त्तो भयकातरः ।
भाण्डारी प्रतिहारी च सप्त सुप्तान् प्रबोधयेत् ॥६॥
**दोहा—**द्वारपाल सेवक पथिक, समय क्षुधातुर पाय ।
भंडारी, विद्यार्थी, सोअत सात जगाय ॥६॥
विद्यार्थी, नौकर, राही, भूखे, भयभीत, भंडारी और द्वारपाल इन सात सोते हुए को भी जगा देना चाहिए ॥६॥
अहिं नृपं च शार्दूलं बरिंट बालकं तथा ।
परश्वानं च मूर्खं च सप्त सुप्तान्न बोधयेत् ॥७॥
**दोहा--**भूपति मृगपति मढ़मति, त्यों बर्रें औ बाल ।
सोवत सात जगाइये, नहिं पर कूकर व्याल ॥७॥
साँप, राजा, शेर, बर्रें, बालक, पराया कुत्ता और मूर्ख मनुष्य ये सात सोते हों तो इन्हें न जगावें ॥७॥
अर्थाधीताश्च यैर्वेदास्तथा शूद्रान्नभोजिनः ।
ते द्विजाः किं करिष्यन्ति निर्विषा इव पन्नगाः ॥८॥