भारतकोश
चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

Chanakya Niti Darpan Hindi

आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा

स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished132 पृष्ठ

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६४ | चाणक्यनीतिदर्पणः

दृष्टिपूतं न्यसेत्पादं वस्त्रपूतं पिबेज्जलम् ।
शास्त्रपूतं वदेद्वाक्यं मनःपूतं समाचरेत् ॥२॥

दोहा--दृष्टिशोधि पग धरिय मग, पीजिय जल पटशोधि ।
शास्त्रशोधि बोलिय बचन, करिय काज मन शोधि ॥२॥

आँख से अच्छी तरह देख-भाल कर पैर धरे, कपड़े से छान कर जल पिये, शास्त्रसम्मत बात कहे और मन को हमेशा पवित्र रखे ॥२॥

सुखार्थी चेत्त्यजेद्विद्यां विद्यार्थी चेत्त्यजेत्सुखम् ।
सुखार्थिनः कुतो विद्या सुखं विद्यार्थिनः कुतः ॥३॥

दोहा--सुख चाहै विद्या तजै, सुख तजि विद्या चाह ।
अर्थिहिं को विद्या कहा, विद्यार्थिहिं सुख काह ॥३॥

जो मनुष्य विषय सुख चाहता हो, वह विद्या के पास न जाय । जो विद्या का इच्छुक हो, वह विषय सुख छोड़े । सुखार्थी को विद्या और विद्यार्थी को सुख कहाँ मिल सकता है ॥३॥

कवयः किं न पश्यन्ति किं न कुर्वन्ति योषितः ।
मद्यपाः किं न जल्पन्ति किं न खादन्ति वायसाः ॥४॥

दोहा--काह न जाने सुकवि जन, करै काह नहिं नारि ।
मद्यप काह न बकि सकै, काग खाहिं केहि वारि ॥४॥

कवि क्या वस्तु नहीं देख पाते ? स्त्रियाँ क्या नहीं कर सकतीं ? शराबी क्या नहीं बक जाते ? और कौवे क्या नहीं खा जाते ॥४॥

रंकं करोति राजानं राजानं रंकमेव च ।
धनिनं निर्धनं चैव निधनं धनिनं विधिः ॥५॥