भारतकोश
चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

Chanakya Niti Darpan Hindi

आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा

स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished132 पृष्ठ

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चाणक्यनीतिदर्पणः ६९

छं०--बनवै अति रंकन भूमिपती अरु भूमिपतीनहुँ रंक अति ।
धनिकै धनहीन फिरै करती अधनीन धनी विधिकेरि गती ॥
विधाता कङ्गाल को राजा, राजा को कङ्गाल, धनी को निर्धन और निर्धन को धनी बनाता ही रहता है ॥५॥

लुब्धानां याचकः शत्रुर्मूर्खाणां बोधको रिपुः ।
जारस्त्रीणां पतिः शत्रुश्चौराणां चन्द्रमा रिपुः॥६॥

दोहा--याचक रिपु लोभीन के, मूढ़नि जो शिषदान ।
जार तियन निज पति कह्यो, चोरन शशि रिपु जान ॥६॥

लोभी का शत्रु है याचक, मूर्ख का शत्रु है उपदेश देने वाला, कुलटा स्त्री का शत्रु है उसका पति और चोरों का शत्रु चन्द्रमा है ॥६॥

येषां न विद्या न तपो न दानं
न चापि शीलं न गुणो न धर्मः ।
ते मृत्युलोके भुवि भारभूता
मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ॥७॥

दोहा--धर्मशील गुण नाहिं जेहि, नहिं विद्या तप दान ।
मनुज रूप भुवि भार ते, विचरत मृग कर जान ॥७॥

जिस मनुष्य में न विद्या है, न तप है, न शील है और न गुण है ऐसे मनुष्य पृथ्वी के बोझ रूप होकर मनुष्य रूप में पशु सदृश जीवन-यापन करते हैं ॥७॥

अन्तः सारविहीनानामुपदेशो न जायते ।
मलयाचलसंसर्गान्न वेणुश्चन्दनायते ॥८॥

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