भारतकोश
चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

Chanakya Niti Darpan Hindi

आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा

स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished132 पृष्ठ

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७० चाणक्यनीतिदर्पणः

सोरठा--शून्य हृदय उपदेश, नाहिं लगै कैसो करिय ।
बसै मलय गिरि देश, तऊ बाँस में वास नहिं ॥८॥

जिनकी अन्तरात्मा में कुछ तत्व नहीं होता ऐसे मनुष्यों को किसी का उपदेश कुछ भी असर नहीं करता । मलयाचल के संसर्ग से और वृक्ष चन्दन हो जाते हैं, पर बाँस चन्दन नहीं होता ॥८॥

यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम् ।
लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति ॥६॥

दोहा--स्वाभाविक नहिं बुद्धि जेहि, ताहि शास्त्र करु काह ।
जो नर नयनविहीन हैं, दर्पण से करु काह ॥९॥

जिसके पास स्वयं बुद्धि नहीं है, उसे क्या शास्त्र सिखा देगा । जिसकी दोनों आँखें फूट गई हों, क्या उसे शीशा दिखा देगा ? ॥९॥

दुर्जनं सज्जनं कर्तुमुपायो न हि भूतले ।
अपानं शतधा धौतं न श्रेष्ठमिन्द्रियं भवेत् ॥१०॥

दोहा--दुर्जन को सज्जन करन, भूतल नहीं उपाय ।
हो अपान इन्द्रिय न शुचि, सौ सौं धोयी जाय ॥१०॥

इस पृथ्वीतल में दुर्जन को सज्जन बनाने का कोई यत्न है ही नहीं । अपान प्रदेश को चाहे सैकड़ों बार क्यों न धोया जाय फिर भी वह श्रेष्ठ इन्द्रिय नहीं हो सकता ॥१०॥

आप्तद्वेषाद्भवेन्मृत्युः परद्वेषाद्धनक्षयः ।
राजद्वेषाद्भवेन्नाशो ब्रह्मद्वेषात्कुलक्षयः ॥११॥