चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचाणक्यनीतिदर्पणः ७१
दोहा--सन्त विरोध से मृत्यु, धन क्षय करि पर द्वेष ।
राजद्वेष से नसत है, कुल क्षय कर द्विज द्वेष ॥११॥
बड़े बूढ़ों से द्वेष करने पर मृत्यु होती है । शत्रु से द्वेष करने पर धन का नाश होता है । राजा से द्वेष करने पर सर्वनाश हो जाता है और ब्राह्मण से द्वेष करने पर कुल का ही क्षय हो जाता है ॥११॥
वरं वनं व्याघ्रगजेन्द्रसेवितं
द्रुमालयं पक्वफलाम्बुसेवनम् ।
तृणेषु शय्या शतजीर्णवल्कलं
न बन्धुमध्ये धनहीनजीवनम् ॥१२॥
छन्द--गज बाघ सेवित बृत्त घन वन माहि बरु रहिबो करै ।
अरु पक्व फल जल सेवनो तृण सेज बरु लहिबो करै ॥
शतछिद्र वल्कल वस्त्र करिबहु चाल यह गहिबो करै ।
निज बन्धु महँ धनहीनह्वै नहिं जीवनो चहिबो करै ।
बाघ और बड़े-बड़े हाथियों के झुण्ड जिस वन में रहते हों उसमें रहना पड़े, निवास करके पके फल तथा जल पर जीवन-यापन करना पड़ जाय, घास फूस पर सोना पड़े और सकड़ों जगह फटे वल्कल वस्त्र पहनना पड़े तो अच्छा पर अपनी बिरादरी में दरिद्र होकर जीवन बिताना अच्छा नहीं है ॥१२॥
विप्रो वृक्षस्तस्य मूलं च सन्ध्या
वेदाः शाखा धर्मकर्माणि पत्रम् ।
तस्मात् मूलं यत्नतो रक्षणीयम् ।
छिन्ने मूले नैव शाखा न पत्रम् ॥१३॥