चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 77, कुल 132 में से
संदर्भ में पढ़ेंचाणक्यनीतिदर्पणः ७५
अथ एकादशोऽध्यायः ॥११॥
दातृत्वं प्रियवक्तृत्वं धीरत्वमुचितज्ञता ।
अभ्यासेन न लभ्यन्ते चत्वारः सहजा गुणाः ॥१॥
दोहा–दानशक्ति प्रिय बोलिबो, धीरज उचित विचार ।
ये गुण सीखे ना मिलैं, स्वाभाविक हैं चार ॥१॥
दानशक्ति, मीठी बात करना, धैर्य धारण करना, समय पर उचित अनुचित का निर्णय करना, ये चार गुण स्वाभाविक सिद्ध हैं । सीखने से नहीं आते ॥१॥
आत्मवर्गं परित्यज्य परवर्गं समाश्रयेत् ।
स्वयमेव लयं याति यथा राज्यमधर्मतः ॥२॥
दोहा–वर्ग आपनो छोड़ि के, गहे वर्ग जो आन ।
सो आपुइ नशि जात है, राज अधर्म समान ॥२॥
जो मनुष्य अपना वग छोड़कर पराये वर्ग में जाकर मिल जाता है तो वह अपने आप नष्ट हो जाता है । जैसे अधर्म से राजा लोग चौपट हो जाते हैं ॥२॥
हस्ती स्थूलतनुः स चांकुशवशःकिं हस्तिमात्रांकुशः।
दीपे प्रज्वलिते प्रणश्यति तमः कि दीपमात्रं तमः ॥
वज्रेणापि हताः पतन्ति गिरयः किं वज्रमात्रन्नगाः ।
तेजो यस्य विराजते स बलवान्स्थूलेषु कः प्रत्ययः ।३।
सवैया–आरि करी रह अंकुश के वश का वह अंकुश भारी करीसों ।
त्यौं तम पुंजहिं नाशत दीपसो दीपकहू अँधियार सरीसों ॥