चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७६ चाणक्यनीतिदर्पणः
वज्र के मारे गिरे गिरिहूँ कहूँ होय भला वह वज्र गिरीसों।
तेज है जासु सोई बलवान कहा विसवास शरीर बड़ोसों ॥३॥
हाथी मोटा-ताजा होता है, किन्तु अंकुश के वश में रहता है तो क्या अंकुश हाथी के बराबर है ? दीपक के जल जानेपर अन्धकार दूर हो जाता है तो क्या अन्धकार के बराबर दीपक है ? इन्द्र के वज्रप्रहार से पहाड़ गिर जाते हैं तो क्या वज्र उन पर्वतों के बराबर है ? इसका मतलब यह निकला कि जिसमें तेज है, वही बलवान् है यों मोटा-ताजा होने से कुछ नहीं होता ॥३॥
कलौ दश सहस्राणि हरिस्त्यजति मेदिनीम् ।
तदर्द्धं जाह्नवीतोयं तदर्द्धं ग्रामदेवताः ॥४॥
दोहा—दस हजार बीते बरस, कलि में तजि हरि देहि ।
तासु अर्द्ध सुर नदी जल, ग्रामदेव अधि तेहिं ॥४॥
कलि के दस हजार वर्ष बीतने पर विष्णु भगवान् पृथ्वी छोड़ देते हैं। पाँच हजार वर्ष बाद गंगा का जल पृथ्वी को छोड़ देता है और उसके आधे यानी ढाई हजार वर्ष में ग्राम-देवता ग्राम छोड़कर चलते हैं ॥४॥
गृहासक्तस्य नो विद्या न दया मांस भोजिनः ।
द्रव्यलुब्धस्य नो सत्यं स्त्रैणस्य न पवित्रता ॥५॥
दोहा—विद्या गृह आसक्त को, दया मांस जे खाहिं ।
लोभहिं होत न सत्यता, जारहिं शुचिता नाहिं ॥५॥
गृहस्थी के जंजाल में फँसे व्यक्ति को विद्या नहीं आती, मांसभोजी के हृदय में दया नहीं आती, लोभी के पास सच्चाई नहीं आती और कामी पुरुष के पास पवित्रता नहीं आती ॥५॥