भारतकोश
चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

Chanakya Niti Darpan Hindi

आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा

स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished132 पृष्ठ

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चाणक्यनीतिदर्पणः ७७

न दुर्जनःसाधुदशामुपैति बहुप्रकारैरपि शिद्यमाणः । आमूलसिक्तःपयसाघृतेन न निम्बवृक्षोमंधुरत्वमेति ।६।

दोहा—साधु दशा को नहिं गहै, दुर्जन बहु सिखलाय । दूध घीव से सींचिये, नाम न तदपि मिठाय ॥६॥

दुर्जन व्यक्ति को चाहे कितना भी उपदेश क्यों न दिया जाय वह अच्छी दशा को नहीं पहुँच सकता । नीम के वृक्ष को चाहे जड़ से लेकर सिर तक घी और दूध से ही क्यों न सींचा जाय फिर भी उसमें मीठापन नहीं आ सकता ॥६॥

अन्तर्गतमलो दुष्टः तीर्थस्नानशतैरपि । न शुद्ध्यति तथा भाण्डं सुरदा दाहितं च यत् ॥७॥

दोहा—मन मलीन खल तीर्थ ये, यदि सौ बार नहाहि । होयँ शुद्ध नहिं जिमि सुरा, बासन दीनेहु दाहि ॥७॥

जिसके हृदय में पाप घर कर चुका है, वह सैकड़ों बार तीर्थ-स्नान करके भी शुद्ध नहीं हो सकता । जैसे कि मदिरा का पात्र अग्नि में झुलसने पर भी पवित्र नहीं होता ॥७॥

न वेत्ति यो यस्य गुण प्रकर्षं स तं सदा निन्दन्ति नाऽत्र चित्रम् । यथा किराती करिकुम्भलब्धां मुक्तां परित्यज्य बिभर्ति गुञ्जाम् ॥८॥

चा० छं०—जो न जानु उत्तमत्व जाहिके गुण गान की । निन्दतो सो ताहि तो अचर्ज कौन खान की ॥ ज्यों किराति हाथि माथ मोतियाँ विहाय कै । घूँघची पहीनतीं विभूषणै बनाय कै ॥८॥