भारतकोश
चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

Chanakya Niti Darpan Hindi

आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा

स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished132 पृष्ठ

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७८ | चाणक्यनीतिदर्पणः

जो जिसके गुणों को नहीं जानता, वह उसकी निन्दा करता रहता है तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। देखो न, जंगल की रहनेवाली भिलनी हाथी के मस्तक की मुक्ता को छोड़कर घुँघची ही पहनती है ॥८॥

ये तु संवत्सरं पूर्णं नित्यं मौनेन भुंजते ।
युगकोटि सहस्रन्तु स्वर्गलोके महीयते ॥६॥

दोहा—जो पूरे इक बरस अर, मौन धरे नित खात ।
युग कोटिन कै सहस तरु, स्वर्ग माहिं पूजि जात ॥९॥

जो लोग केवल एक वर्ष तक, मौन रहकर भोजन करते हैं वे दश हजार वर्ष तक स्वर्गवासियों से सम्मानित होकर स्वर्ग में निवास करते हैं ॥९॥

कामं क्रोधं तथा लोभं स्वादुशृंगारकौतुकम् ।
अतिनिद्राऽतिसेवा च विद्यार्थी ह्यष्ट वर्जयेत् ॥१०॥

सोरठा—काम क्रोध अरु स्वाद, लोभ शृङ्गारहिं कौतुकहिं ।
अति सेवन निद्राहि, विद्यार्थी आठौ तजे ॥१०॥

काम, क्रोध, लोभ, स्वाद, शृङ्गार, खेल-तमाशे, अधिक नींद और किसी की अधिक सेवा, विद्यार्थी इन आठ कर्मों को त्याग दे। क्योंकि ये आठ विद्याध्ययन में बाधक हैं ॥१०॥

अकृष्टफलमूलानि वनवासरतः सदा ।
कुरुतेऽहरहः श्राद्धमृषिर्विप्रः स उच्यते ॥११॥

दोहा—बिनु जोते महि मूल फल, खाय रहे बन माहिं ।
श्राद्ध करै जो प्रति दिवस, कहिय विप्र ऋषि ताहि ॥११॥