भारतकोश
चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

Chanakya Niti Darpan Hindi

आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा

स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished132 पृष्ठ

पृष्ठ 81, कुल 132 में से

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चाणक्यनीतिदर्पणः ७९

जो ब्राह्मण बिना जोते फल पर जीवन बिताता, हमेशा वन में रहना पसन्द करता और प्रति दिन श्राद्ध करता है, उस विप्र को ऋषि कहना चाहिए ॥११॥

एकाहारेण सन्तुष्टः षट्कर्मनिरतः सदा ।
ऋतुकालेऽभिगामी च स विप्रो द्विज उच्यते ॥१२॥

सोरठा—एकै बार अहार, तुष्ट सदा षटकर्मरत ।
ऋतु में प्रिया विहार, करै बनै सो द्विज कहै ॥१२॥

जो ब्राह्मण केवल एक बार के भोजन से सन्तुष्ट रहता और यज्ञ, अध्ययन दानादि षट्कर्मों में सदा लीन रहता और केवल ऋतु-काल में स्त्रीगमन करता है, उसे द्विज कहना चाहिए ॥१२॥

लौकिके कर्मणि रतः पशूनां परिपालकः ।
वाणिज्यकृषिकर्ता यः स विप्रो वैश्य उच्यते ॥१३॥

सोरठा—निरत लोक के कर्म, पशु पालै बानिज करै ।
खेती में मन कर्म, करै विप्र सो वैश्य है ॥१३॥

जो ब्राह्मण सांसारिक धन्धों में लगा रहता है पशु पालन करता, वाणिज्य व्यवसाय करता या खेती ही करता है, वह विप्र वैश्य कहलाता है ॥१३॥

लाक्षादितैलनीलानां कौसुम्भमधुसर्पिषाम् ।
विक्रेता मद्यमांसानां स विप्रः शूद्र उच्यते ॥१४॥

सोरठा—लाख आदि मदमांसु, घीव कुसुम अरु नील मधु ।
तेल बेचियत तासु, शूद्र जानिये विप्र यदि ॥१४॥

जो लाख, तेल, नील कुसुम, शहद, घी, मदिरा और मांस बेचता है, उस ब्राह्मण को शूद्र-ब्राह्मण कहते हैं ॥१४॥

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