चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 82, कुल 132 में से
संदर्भ में पढ़ें८० चाणक्यनीतिदर्पणः
परकार्यविहन्ता च दाम्भिकः स्वार्थधकः ।
छली द्वेषी मृदुक्रूरो विप्रो मार्जार उच्यते ॥१५॥
सोरठा—दंभी स्वार्थ सूर, पर कारज घालै छली ।
द्वेषी कोमल क्रूर, विप्र बिल्लार कहाव ॥१५॥
जो औरों का काम बिगाड़ता, पाखण्डपरायण रहता, अपना मतलब साधने में तत्पर रहता, छल, आदि कर्म करता ऊपर से मीठा, किन्तु हृदय से क्रूर रहता ऐसे ब्राह्मण को मार्जार विप्र कहते हैं ॥१५॥
वापीकूपतड़ागानामारामसुरवेश्मनाम् ।
उच्छेदने निराशंकः स विप्रो म्लेच्छ उच्यते ॥१६॥
सोरठा—कूप बावली बाग, औ तड़ाग सुरमन्दिरहिं ।
नाशै जो भय त्यागि, म्लेच्छ विप्र कहाव सो ॥१६॥
जो बावली, कुआँ, तालाब, बगीचा और देवमन्दिरों के नष्ट करने में नहीं हिचकता, ऐसे ब्राह्मण को ब्राह्मण न कहकर म्लेच्छ कहा जाता है ॥१६॥
देवद्रव्यं गुरुद्रव्यं परदाराभिमर्षणम् ।
निर्वाहः सर्वभूतेषु विप्रश्चाण्डाल उच्यते ॥१७॥
सोरठा—परनारी रत जोय, जो गुरु सुर धन को हरै ।
द्विज चाण्डाल सो होय, सबमें करु निर्वाह जो ॥१७॥
जो देवद्रव्य और गुरुद्रव्य अपहरण करता, परायी स्त्री के साथ दुराचार करता और लोगों की वृत्ति पर ही जो अपना निर्वाह करता है, ऐसे ब्राह्मण को चाण्डाल कहा जाता है ॥१७॥