चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 83, कुल 132 में से
संदर्भ में पढ़ें६ चाणक्यनीतिदर्पणः ८१
देयं भोज्यधनं सुकृतिभिर्नो संचयस्तस्य वै श्रीकर्णस्य बलेश्च विक्रमपतेरद्यापि कीर्त्तिः स्थिता । अस्माकं मधुदानभोगरहितं नष्टं चिरात्सञ्चितं निर्वाणादिति नष्टपादयुगलं घर्षन्त्यहो मक्षिकाः ॥१८॥
सवैया—मतिमानको चाहिये वे धन भोज्य सुसंचहिं नाहिं दियोई करें ते बलि विक्रम कर्णहू कीरति, आजुलों लोग कहोई करें ॥ चिरसंचि मधु हम लोगन को बिनु भोग दिये नसिबोई करें । यह जानि गये मधुनास दोऊ मधुमखियाँ पाँव घिसोई करें ।
आत्म-कल्याण की भावनावालों को चाहिये कि अपनी साधारण आवश्यकता से अधिक बचा हुआ अन्न वस्त्र या धन दान कर दिया करें, जोड़ें नहीं। दान ही की बदौलत कर्ण बलि और महाराज विक्रमादित्य की कीर्ति आज भी विद्यमान है। मधुमक्खियों को देखिये वे यही सोचती हुई अपने पैर रगड़तीं हैं कि "हाय ! मैंने दान और भोग से रहित मधु को बहुत दिनों में इकट्ठा किया और वह क्षण में दूसरा ले गया"॥१८॥
इति चाणक्ये एकादशोऽध्यायः ॥११॥
अथ द्वादशोऽध्यायः ।
सानन्दं सदनं सुतास्तु सुधियः कान्ता प्रियालापिनी इच्छापूर्तिधनं स्वयोषितिरतिः स्वाज्ञापराः सेवकाः