चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 84, कुल 132 में से
संदर्भ में पढ़ें८२ चाणक्यनीतिदर्पणः
आतिथ्यं शिवपूजनं प्रतिदिनं मिष्ठान्नपानं गृहे साधोः सङ्गमुपासते च सततं धन्यो गृहस्थाश्रमः॥१॥
स० सानन्दमंदिर पंडित पुत्र सुबोल रहै तिरिया पुनि प्राणपियारी। इच्छित सम्पति और स्वतीय रति रहै सेवक भौंह निहारी॥ आतिथ औ शिवपूजन रोज रहे घर संच सुअन्न औ वारी। साधुन संग उपासात है नित धन्य अहै गृह आश्रम धारी॥१॥
आनन्द से रहने लायक घर हो, पुत्र बुद्धिमान् हो, स्त्री मधुरभाषिणी हो, मानमाना धन हो, अपनी स्त्री पर प्रेम हो, सेवक आज्ञाकारी हो, घर आये हुए अतिथियों का सत्कार हो, प्रति दिन शिवजी का पूजन होता रहे और सज्जनों का साथ हो तो फिर वह गृहस्थाश्रम धन्य है॥१॥
आर्तेषु विप्रेषु दयान्वितश्चे- च्छ्रद्धेण या स्वल्पमुपैति दानम्। अनन्तपारं समुपैति दानम्। यद्दीयते तन्न लभेद् द्विजेभ्यः॥२॥
दोहा—दिया दयायुत साधुसो, आरत विप्रहिं जौन। थोड़ी मिलै अनन्त ह्वै, द्विज से मिलै न तौन॥२॥
जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक और दयाभाव से दीन-दुखियों तथा ब्राह्मणों को थोड़ा भी दान दे देता है तो वह उसे अनन्तगुणा होकर उन दीन ब्राह्मणों से नहीं बल्कि ईश्वर के दरबार से मिलता है॥२॥