भारतकोश
चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

Chanakya Niti Darpan Hindi

आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा

स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished132 पृष्ठ

पृष्ठ 85, कुल 132 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 85

चाणक्यनीतिदर्पण। ८३

दाक्षिण्यं स्वजने दया परजने शाठ्यं सदा दुर्जने प्रीतिःसाधुजने स्मयः खलजने विद्वज्जने चार्जवम् । शौर्यं शत्रुजने क्षमा गुरुजने नारीजने धूर्तता इत्थं ये पुरुषा कलासु कुशलास्तेष्वेव लोकस्थितिः ॥३॥

कविता–दक्षता स्वजनबीच दया परजन बीच शठता सदा ही रहे बीच दुरजन के । प्रीति साधुजन में खलन माहिं अभिमान सरल स्वभाव रहे बीच पण्डितन के। शत्रुन में शूरता सयानन में क्षमा पूर धुरताई राखे फेरि बीच नारिजन के। ऐसे सब कला में कुशल रहैं जेते लोग लोक थिति रहि रहे बीच तिनहिन के ॥३॥

जो मनुष्य अपने परिवार में उदारता, दुर्जनों के साथ शठता, सज्जनों से प्रेम, दुष्टों में अभिमान, विद्वानों में कोमलता, शत्रुओं में वीरता, गुरुजनों में क्षमा, और स्त्रियों में धूर्तता का व्यवहार करते हैं । ऐसे ही कलाकुशल मनुष्य संसार में आनंद के साथ रह सकते हैं ॥३॥

हस्तौ दानविवर्जितौ श्रुतिपुटौ सारस्वतद्रोहिणौ नेत्रे साधुवलोकनेन रहिते पादौ न तीर्थं गतौ ॥ अन्यायार्जितवित्तपूर्णमुदरं गर्वेण तुङ्गं शिरो । रे रे जम्बुक मुञ्चमुञ्च सहसा नीचं सुनिन्द्यं वपुः ॥४॥

छ०–यह पाणि दान विहीन कान पुराण वेद सुने नहीं । अरु आँखि साधुन दर्शहीन न पाँव तीरथ में कहीं ॥