चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 86, कुल 132 में से
संदर्भ में पढ़ें७४ चाणक्यनीतिदर्पणः
अन्याय वित्त भरो सुपेट उठयो शिरो अभिमानहीं । वपु नीच निंदित छोड़ु छोड़ अरे सियार सो वेगहीं ॥ १ ॥
जिसके दोनों हाथ दान विहीन हैं, दोनों कान विद्याश्रवण से परांगमुख हैं, नेत्र सज्जनों का दर्शन नहीं करते और पैर तीर्थों का पर्यटन नहीं करते । जो अन्याय से अर्जित धन से पेट पालते हैं और गर्व से सिर ऊँचा करके चलते हैं, ऐसे मनुष्यों का रूप धारण किये हुए ऐ सियार ! तू झटपट अपने इस नीच और निन्दनीय शरीर को छोड़ दे ॥ ४ ॥
येषां श्रीमद्यशोदा सुतपदकमले नास्ति भक्तिर्नराणां येषामाभीरकन्याप्रियगुणकथने नानुरक्ता रसज्ञा । येषां श्रीकृष्णलीलाललितरसकथा सादरोनैव कर्णौ धिक्तांधिक्तांधिगेतां कथयतिसततं कीर्तनस्थोमृदङ्गः
छं०-जो नर यसुमतिसुत चरणन में भक्ति हृदय से कीन नहीं । जो राधाप्रिय कृष्ण चन्द्र के गुण जिह्वा नाहिं कहीं ॥ जिनके दोउ कानन माहिं कथारस कृष्ण को पीय नहीं । कीर्तन माहिं मृदंग इन्हें धिक् २एहि म् ति कहेहि कहीं ।५।
कीर्तन के समय बजता हुआ मृदंग कहता है कि जिन मनुष्यों को श्रीकृष्णचन्द्रजी के चरण कमलों में भक्ति नहीं है श्रीराधारानी के प्रिय गुणों के कहने में जिसकी रसना अनुरक्त नहीं और श्रीकृष्ण भगवान् की लीलाओं को सुनने के लिए जिसके कान उत्सुक नहीं हैं । ऐसे लोगों को धिक्कार है, धिक्कार है ॥ ५ ॥