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चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)

Chanakya Niti Darpan Hindi

आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा

स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished132 पृष्ठ

६ चाणक्यनीतिदर्पणः ८१

देयं भोज्यधनं सुकृतिभिर्नो संचयस्तस्य वै श्रीकर्णस्य बलेश्च विक्रमपतेरद्यापि कीर्त्तिः स्थिता । अस्माकं मधुदानभोगरहितं नष्टं चिरात्सञ्चितं निर्वाणादिति नष्टपादयुगलं घर्षन्त्यहो मक्षिकाः ॥१८॥

सवैया—मतिमानको चाहिये वे धन भोज्य सुसंचहिं नाहिं दियोई करें ते बलि विक्रम कर्णहू कीरति, आजुलों लोग कहोई करें ॥ चिरसंचि मधु हम लोगन को बिनु भोग दिये नसिबोई करें । यह जानि गये मधुनास दोऊ मधुमखियाँ पाँव घिसोई करें ।

आत्म-कल्याण की भावनावालों को चाहिये कि अपनी साधारण आवश्यकता से अधिक बचा हुआ अन्न वस्त्र या धन दान कर दिया करें, जोड़ें नहीं। दान ही की बदौलत कर्ण बलि और महाराज विक्रमादित्य की कीर्ति आज भी विद्यमान है। मधुमक्खियों को देखिये वे यही सोचती हुई अपने पैर रगड़तीं हैं कि "हाय ! मैंने दान और भोग से रहित मधु को बहुत दिनों में इकट्ठा किया और वह क्षण में दूसरा ले गया"॥१८॥

इति चाणक्ये एकादशोऽध्यायः ॥११॥


अथ द्वादशोऽध्यायः ।

सानन्दं सदनं सुतास्तु सुधियः कान्ता प्रियालापिनी इच्छापूर्तिधनं स्वयोषितिरतिः स्वाज्ञापराः सेवकाः

८२ चाणक्यनीतिदर्पणः

आतिथ्यं शिवपूजनं प्रतिदिनं मिष्ठान्नपानं गृहे साधोः सङ्गमुपासते च सततं धन्यो गृहस्थाश्रमः॥१॥

स० सानन्दमंदिर पंडित पुत्र सुबोल रहै तिरिया पुनि प्राणपियारी। इच्छित सम्पति और स्वतीय रति रहै सेवक भौंह निहारी॥ आतिथ औ शिवपूजन रोज रहे घर संच सुअन्न औ वारी। साधुन संग उपासात है नित धन्य अहै गृह आश्रम धारी॥१॥

आनन्द से रहने लायक घर हो, पुत्र बुद्धिमान् हो, स्त्री मधुरभाषिणी हो, मानमाना धन हो, अपनी स्त्री पर प्रेम हो, सेवक आज्ञाकारी हो, घर आये हुए अतिथियों का सत्कार हो, प्रति दिन शिवजी का पूजन होता रहे और सज्जनों का साथ हो तो फिर वह गृहस्थाश्रम धन्य है॥१॥

आर्तेषु विप्रेषु दयान्वितश्चे- च्छ्रद्धेण या स्वल्पमुपैति दानम्। अनन्तपारं समुपैति दानम्। यद्दीयते तन्न लभेद् द्विजेभ्यः॥२॥

दोहा—दिया दयायुत साधुसो, आरत विप्रहिं जौन। थोड़ी मिलै अनन्त ह्वै, द्विज से मिलै न तौन॥२॥

जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक और दयाभाव से दीन-दुखियों तथा ब्राह्मणों को थोड़ा भी दान दे देता है तो वह उसे अनन्तगुणा होकर उन दीन ब्राह्मणों से नहीं बल्कि ईश्वर के दरबार से मिलता है॥२॥

चाणक्यनीतिदर्पण। ८३

दाक्षिण्यं स्वजने दया परजने शाठ्यं सदा दुर्जने प्रीतिःसाधुजने स्मयः खलजने विद्वज्जने चार्जवम् । शौर्यं शत्रुजने क्षमा गुरुजने नारीजने धूर्तता इत्थं ये पुरुषा कलासु कुशलास्तेष्वेव लोकस्थितिः ॥३॥

कविता–दक्षता स्वजनबीच दया परजन बीच शठता सदा ही रहे बीच दुरजन के । प्रीति साधुजन में खलन माहिं अभिमान सरल स्वभाव रहे बीच पण्डितन के। शत्रुन में शूरता सयानन में क्षमा पूर धुरताई राखे फेरि बीच नारिजन के। ऐसे सब कला में कुशल रहैं जेते लोग लोक थिति रहि रहे बीच तिनहिन के ॥३॥

जो मनुष्य अपने परिवार में उदारता, दुर्जनों के साथ शठता, सज्जनों से प्रेम, दुष्टों में अभिमान, विद्वानों में कोमलता, शत्रुओं में वीरता, गुरुजनों में क्षमा, और स्त्रियों में धूर्तता का व्यवहार करते हैं । ऐसे ही कलाकुशल मनुष्य संसार में आनंद के साथ रह सकते हैं ॥३॥

हस्तौ दानविवर्जितौ श्रुतिपुटौ सारस्वतद्रोहिणौ नेत्रे साधुवलोकनेन रहिते पादौ न तीर्थं गतौ ॥ अन्यायार्जितवित्तपूर्णमुदरं गर्वेण तुङ्गं शिरो । रे रे जम्बुक मुञ्चमुञ्च सहसा नीचं सुनिन्द्यं वपुः ॥४॥

छ०–यह पाणि दान विहीन कान पुराण वेद सुने नहीं । अरु आँखि साधुन दर्शहीन न पाँव तीरथ में कहीं ॥

७४ चाणक्यनीतिदर्पणः

अन्याय वित्त भरो सुपेट उठयो शिरो अभिमानहीं । वपु नीच निंदित छोड़ु छोड़ अरे सियार सो वेगहीं ॥ १ ॥

जिसके दोनों हाथ दान विहीन हैं, दोनों कान विद्याश्रवण से परांगमुख हैं, नेत्र सज्जनों का दर्शन नहीं करते और पैर तीर्थों का पर्यटन नहीं करते । जो अन्याय से अर्जित धन से पेट पालते हैं और गर्व से सिर ऊँचा करके चलते हैं, ऐसे मनुष्यों का रूप धारण किये हुए ऐ सियार ! तू झटपट अपने इस नीच और निन्दनीय शरीर को छोड़ दे ॥ ४ ॥

येषां श्रीमद्यशोदा सुतपदकमले नास्ति भक्तिर्नराणां येषामाभीरकन्याप्रियगुणकथने नानुरक्ता रसज्ञा । येषां श्रीकृष्णलीलाललितरसकथा सादरोनैव कर्णौ धिक्तांधिक्तांधिगेतां कथयतिसततं कीर्तनस्थोमृदङ्गः

छं०-जो नर यसुमतिसुत चरणन में भक्ति हृदय से कीन नहीं । जो राधाप्रिय कृष्ण चन्द्र के गुण जिह्वा नाहिं कहीं ॥ जिनके दोउ कानन माहिं कथारस कृष्ण को पीय नहीं । कीर्तन माहिं मृदंग इन्हें धिक् २एहि म् ति कहेहि कहीं ।५।

कीर्तन के समय बजता हुआ मृदंग कहता है कि जिन मनुष्यों को श्रीकृष्णचन्द्रजी के चरण कमलों में भक्ति नहीं है श्रीराधारानी के प्रिय गुणों के कहने में जिसकी रसना अनुरक्त नहीं और श्रीकृष्ण भगवान् की लीलाओं को सुनने के लिए जिसके कान उत्सुक नहीं हैं । ऐसे लोगों को धिक्कार है, धिक्कार है ॥ ५ ॥

चाणक्यनीतिदर्पणः ८५

पत्रं नैव यदा करीरविटपे दोषो वसन्तस्य किं नोलूकोऽप्यवलोकते यदि दिवा सूर्यस्य किं दूषणम्। वर्षा नैव पतन्ति चातकमुखे मेघस्य किं दूषणम् । यत्पूर्वं विधिना ललाटलिखितं तन्मार्जितुं कः क्षमः

छं०-पात न होय करीरन में यदि दोष बसन्तहि कौन तहाँ है। त्यौं जब देखि सकै न उलूक दिये तहँ सूरज दोष कहाँ है। चातक आनन बूँदपरै नहिं मेघन दूषण कौन यहाँ है॥ जो कछु पूरब माथ लिखा विधि मेटनको समरथ कहाँ है॥

यदि करीर के पेड़ में पत्ते नहीं लगते तो बसन्त ऋतु का क्या दोष ? उल्लू दिन को नहीं देखता तो इसमें सूर्य का क्या दोष ? बरसात की बूँदें चातक के मुख में नहीं गिरतीं तो इसमें मेघ का क्या दोष ? विधाता ने पहले ही ललाट में जो लिख दिया है, उसे कौन मिटा सकता है ॥ ६ ॥

सत्सङ्गाद् भवति हि साधुता खलानाम् । साधूनां न हि खलसंगतेः खलत्वम् ॥ आमोदं कुसुमभवं मृदेव धत्ते मृद्गन्धं नहि कुसुमानि धारयन्ति ॥७॥

व० ति०-सतसंगसों खलन साधु स्वभाव लेव । साधू न दुष्टपन संग परेहु लेव ॥

८६ चाणक्यनीतिदर्पणः

माटिहि बास कछु फूलन धार पावै ।
माटी सुवास कहुँ फूल नहिं बसावै ॥ ७ ॥

सत्संग से दुष्ट सज्जन हो जाते हैं । पर सज्जन उनके संग से दुष्ट नहीं होते । जैसे फूल की सुगंधि को मिट्टी अपनाती है, पर फूल मिट्टी की सुगन्धि को नहीं अपनाते ॥ ७ ॥

साधूनां दर्शनं पुण्यं तीर्थीभूता हि साधवः ।
कालेन फलते तीर्थं सद्यः साधुसमागमः ॥८॥

दोहा—साधू दर्शन पुण्य है, साधु तीर्थ के रूप ।
काल पाय तीरथ फलै, तुरतहिं साधु अनूप ॥ ८ ॥

सज्जनों का दर्शन बड़ा पुनीत होता है । क्योंकि साधुजन तीर्थ के समान रहते हैं । बल्कि तीर्थ तो कुछ समय बाद फल देते हैं पर सज्जनों का संत्संग तत्काल फलदायक है ॥ ८ ॥

विप्राऽस्मिन्नगरे महान् कथय कस्तालद्रुमाणां गणः
को दाता रजको ददाति वसनं प्रातर्गृहीत्वा निशि ।
को दक्षः परवित्तदारहरणे सर्वोऽपि दक्षो जनः
कस्माज्जीवसि हे सखे विष कृमि न्यायेन जीवाम्यहम् ।

कवित्त—कहौ या नगर में महान् है कौन ? विप्र ! तारन के वृक्षन के कतार के कतार हैं । दाता कहो कौन है ? रजक देत साँझ आनि धोय शुभ वस्त्र को जो देत सकार है । दक्ष कहौ कौन है ? प्रत्यक्ष सबही हैं दक्ष हरने को कुशल परायो धनदार हैं

चाणक्यनीतिदर्पणः ८७

हैं ? कैसे तुम जीवत कहो मोसों मीत ! विष कृमिन्याय कर लीज निरधार है ॥ ९ ॥

कोई पथिक किसी नगर में जाकर किसी सज्जन से पूछता है हे भाई ! नगर में कौन बड़ा है ? उसने उत्तर दिया—बड़े तो ताड़ के पेड़ हैं। ( प्रश्न ) दाता कौन है ? (उत्तर) धोबी, जो सबेरे कपड़े ले जाता और शाम को वापस दे जाता है । ( प्रश्न ) यहाँ चतुर कौन है ? (उत्तर) पराई दौलत ऐंठने में यहाँ सभा चतुर हैं । (प्रश्न) तो फिर हे सखे ! तुम यहाँ जीते कैसे हो ? ( उत्तर ) उसी तरह जीता हूँ जैसे कि विष का कीड़ा विष में रहता हुआ भी जिन्दा रहता है ॥ ९ ॥

न विप्रपादोदकपंकजानि
न वेदशास्त्रध्वनिगर्जितानि ।
स्वाहास्वधाकारविवर्जितानि
श्मशानतुल्यानिगृहाणि तानि ॥१०॥

दोहा—
विप्रचरण के उदक से, होत जहाँ नहिं कीच ।
वेद ध्वनि स्वाहा नहीं, वे गृह मर्घट नीच ॥

जिस घर में ब्राह्मणों के पैर धुलने से कीचड़ नहीं होता, जिसके यहाँ वेद और शास्त्रों की ध्वनि का गर्जन नहीं और जिस घर में स्वाहा स्वधा का कभी उच्चारण नहीं होता, ऐसे घरों को श्मशान के तुल्य समझना चाहिए ॥ १० ॥

४४ चाणक्यनीतिदर्पणः

सत्यं माता पिता ज्ञानं धर्मो भ्राता दया सखा शांतिः पत्नी क्षमा पुत्रः षडेते मम बान्धवाः ॥११॥

सोरठा—सत्य मातु पितु ज्ञान, सखा दया भ्राता धरम ।
तिया शांति सुत जान, क्षमा यही षट् बन्धु मम ॥११॥

कोई ज्ञानी किसी के प्रश्न का उत्तर देता हुआ कहता है कि सत्य मेरी माता है, ज्ञान पिता है धर्म भाई है, दया मित्र है, शांति स्त्री है और क्षमा पुत्र है, ये ही मेरे छः बान्धव हैं ॥११॥

अनित्यानि शरीराणि विभवो नैव शाश्वतः ।
नित्यं सन्निहितो मृत्युः कर्त्तव्यो धर्मसंग्रहः ॥१२॥

सोरठा—है अनित्य यह देह, विभव सदा नाहिं थिर है ।
निकट मृत्यु नित हेय, चहिए कीन संग्रह धरम ॥१२॥

शरीर क्षणभंगुर है, धन भी सदा रहनेवाला नहीं है, मृत्यु बिल्कुल समीप विद्यमान है। इसलिए धर्म का संग्रह करो ।

निमन्त्रणोत्सवा विप्रा गावो नवतृणोत्सवाः ।
पत्युत्साहयुता भार्या अहं कृष्ण ! रणोत्सवः ॥१३॥

दोहा—पति उत्सव युवतीन को, गौवन को नवघास ।
नेवत द्विजन को हे हरि, मोहिं उत्सव रणवास ॥१३॥

ब्राह्मण का उत्सव है निमन्त्रण, गौओं का उत्सव है नई घास । स्त्री का उत्सव है पति का आगमन, किन्तु हे कृष्ण ! मेरा उत्सव है युद्ध ॥१३॥

. चाणक्यनीतिदर्पणः ४९

मातृवत्परदारेषु परद्रव्याणि लोष्ठवत् । आत्मवत्सर्वभूतानि यः पश्यति स पंडितः ॥१४॥ दोहा—पर धन माटी के सरिस, परतिय माता मेष । आपु सरीखे जगत सब, जो देखे सो देख ॥१४॥

जो मनुष्य परायी स्त्री को माता के समान समझता, पराया धन, मिट्टी के ढेले के समान और और अपने ही तरह सब प्राणियों के सुख-दुःख समझता वही पण्डित है ॥१४॥

धर्मे तत्परता मुखे मधुरता दाने समुत्साहता मित्रेऽवंचकता गुरौ विनयता चित्तेऽतिगम्भीरता । आचारे शुचिता गुणे रसिकता शास्त्रेषु विज्ञातृता रूपे सुन्दरता शिवे भजनता त्वय्यस्ति भो राघवः ॥

कविता-धर्म माहिं रुचि मुख मीठी बानी दान वचन शक्ति मित्र संग नहिं ठगने बान है । वृद्धमाहिं नम्रता अरु मन में गम्भीरता शुद्ध है आचरण गुण विचार विमल हैं । शास्त्र का विशेष ज्ञान रूप भी सुहावन है शिवजी के भजन का सब काल ध्यान है । कहे पुष्पवन्त ज्ञानी राघव बीच मानों सब ओर इक ठौर कहिन को न मान है ॥१५॥

वशिष्ठजी श्रीरामचन्द्रजी से कहते हैं—हे राघव ! धर्म में तत्परता, मुख में मधुरता, दान में उत्साह, मित्रों में निश्छल व्यवहार, गुरुजनों के समक्ष नम्रता, चित्त में गम्भीरता, आचार

९०

चाणक्यनीतिदर्पणः

में पवित्रता, शास्त्रों में विज्ञता, रूप में सुन्दरता और शिवजी में भक्ति, ये गुण केवल आप ही में हैं ॥१५॥

काष्ठं कल्पतरुः सुमेरुरचलश्चिन्तामणिः प्रस्तरः सूर्यस्तीव्रकरः शशीक्षयकरः क्षारो हि वारां निधिः । कामो नष्टतनुर्बलिर्दितिसुतो नित्यं पशुः कामगौः नैस्तांस्ते तुलयामि भो रघुपते कस्योपमादीयते ॥१६॥

कवित्त—कल्पवृक्ष काठ अंचल सुमेरु चिन्तामणिन भी जाति पत्थर की जानिये। सूरुज में उष्णता अरु कलाहीन चन्द्रमा है सागरहू का जल खारो यह जानिये। कामदेव नष्टदेव अरु राजा बली दैत्यदेव कामधेनु गौ को भी पशु मानिये। उपमा श्रीराम की इन से कुछ तुलैना और कौन वस्तु जिसे उपमा बखानिये ॥१६॥

कल्पवृक्ष काष्ठ है, सुमेरु अचल है, चिन्तामणि पत्थर है, सूर्य की किरणें तीखी हैं, चन्द्रमा घटता-बढ़ता है, समुद्र खारा है, कामदेव शरीर रहित है, बलि दैत्य है और कामधेनु पशु है। इसलिए इनके साथ तो मैं आपकी तुलना नहीं कर सकता। तब हे रघुपते ! किसके साथ आपकी उपमा दी जाय ? ॥१६॥

विद्या मित्रं प्रवासे च भार्या मित्रं गृहेषु च । व्याधितस्यौषधं मित्रं धर्म मित्रं मृतस्य च ॥

दोहा—विद्या मित्र विदेश में, घरमें नारी मित्र । रोगिहिं औषधि मित्र है, मरे धर्म ही मित्र ॥१७॥

प्रवास में विद्या हित करती है, घर में स्त्री है, रोगग्रस्त

चाणक्यनीतिदर्पणः ९१

पुरुष का हित औषधि से होता है और धर्म मरे का उपकार करता है ॥१७॥

विनयं राजपुत्रेभ्यः पण्डितेभ्यः सुभाषितम् । अनृतं द्यूतकारेभ्यःस्त्रीभ्यः शिक्षेत् कैतवम् ॥१८॥

दोहा–राजसुत से विनय अरु, बुध से सुन्दर बात । झूठ जुआरिन से कपट, स्त्री से सीखी जात ॥१८॥

मनुष्य को चाहिए कि विनय (तहजीब) राजकुमारों से, अच्छी-अच्छी बातें पण्डितों से, झुठाई जुआरियों से और छल-कपट स्त्रियों से सीखे ॥ १८ ॥

अनालोक्यं व्ययं कर्ता अनाथः कलहप्रियः । आर्तः स्त्रीसर्वक्षेत्रेषु नरः शीघ्रं विनश्यति ॥१६॥

दोहा–बिन विचार खर्चा करे, झगरे बिनहिं सहाय । आतुर सब तिय में रहै, सोई बेगि नसाय ॥१९॥

बिना समझे-बूझे खर्च करनेवाला अनाथ झगड़ालू, और सब तरह की स्त्रियों के लिए बेचैन रहनेवाला मनुष्य देखते-देखते चौपट हो जाता है ॥१९॥

नाऽऽहारं चिन्तयेत्प्राज्ञो धर्ममेकं हि चिन्तयेत् । आहारो हि मनुष्याणां जन्मना सह जायते ॥२०॥

दोहा–नहिं आहार चिन्तहिं सुमति, चिन्तहिं धर्म हिं एक । होहिं साथ ही जनम के, नरहिं अहार अनेक ॥२०॥

विद्वान् को चाहिए कि वह भोजनकी चिन्ता न किया

९२ चाणक्यनीतिदर्पणः

करे। चिन्ता करे केवल धर्म की क्योंकि आहार तो मनुष्य के पैदा होने के साथ ही नियत हो जाया करता है ॥२०॥

धनधान्यप्रयोगेषु विद्यासंग्रहणे तथा ।
आहारे व्यवहारे च त्यक्तलज्जः सुखीभवेत् ॥२१॥
**दोहा—**लेन देन धन अन्न के, विद्या पढ़ने माहिं ।
भोजन सखा विवाह में, तजै लाज सुख ताहिं ॥२१॥
जो मनुष्य धन तथा धान्य के व्यवहार में, पढ़ने-लिखने में, भोजन में और लेन-देन में निर्लज्ज होता है, वही सुखी रहता है ॥२१॥

जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः ।
स हेतु सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च ॥२२॥
**दोहा—**एक एक जल बुन्द के, परत घटहु भरि जाय ।
सब विद्या धन धर्म को, कारण यही कहाय ॥२२॥
धीरे-धीरे एक-एक बूँद पानी से घड़ा भर जाता है । यही बात विद्या, धर्म और धन के लिए लागू होती है । तात्पर्य यह कि उपयुक्त वस्तुओं के संग्रह में जल्दी न करे । करता चले धीरे-धीरे कभी पूरा हो ही जायगा ॥२२॥

वयसः परिणामेऽपि यः खलः खल एव सः ।
सम्पक्वमपि माधुर्य नापयातीन्द्रवारुणम् ॥२३॥
**दोहा—**बीत गयेहू उमिर के, खल खलहीं रहि जाय ।
पकेहू मिठाई गुण कहूँ, नाहिं इन्द्रारू पाय ॥२३॥

चाणक्यनीतिदर्पणः ९३

अवस्था के ढल जाने पर भी जो खल है वह खल ही बना रहता है क्योंकि अच्छी तरह पका हुआ इन्द्रायन मीठा-पन को नहीं प्राप्त होता ॥२३॥

इति चाणक्ये द्वादशोऽध्यायः ॥१२॥


अथ त्रयोदशोऽध्यायः

मुहूर्त्तमपि जीवेच्च नरः शुक्लेन कर्मणा ।
न कल्पमपि कष्टेन लोकद्वयविरोधिना ॥ १ ॥

दोहा—वरु जीवै मुहूर्त्त भर, करिके शुचि सत्कर्म ।
नहिं भरि कल्पहु लोक दुहुँ, करत विरोध अधर्म ॥१॥

मनुष्य यदि उज्ज्वल कर्म करके एक दिन भी जिन्दा रहे तो उसका जीवन सफल है। इसके बदले इहलोक और परलोक इन दोनों के विरुद्ध कार्य करके कल्प भर जिवे तो वह जीना अच्छा नहीं है ॥१॥

गते शोको न कर्त्तव्यो भविष्यं नैव चिन्तयेत् ।
वर्त्तमानेन कालेन प्रवर्त्तन्ते विचक्षणाः ॥ २ ॥

दोहा—गत वस्तुहिं सोचै नहीं, गुनै न होनी हार ।
कार्य करहिं परवीन जन, आय परे अनुसार ॥२॥

जो बात बीत गयी उसके लिए सोच न करो। और न

९४ | चाणक्यनीतिदर्पणः

आगे होनेवाली के ही लिए चिन्ता करो। समझदार लोग सामने की बात को ही हल करने की चिन्ता करते हैं ॥२॥

स्वभावेन हि तुष्यन्ति देवाः सत्पुरुषाः पिता ।
ज्ञातयः स्नान-पानाभ्यां वाक्यदानेन पंडिताः ॥३॥

दोहा— देव सत्पुरुष औ पिता, करहिं सुभाव प्रसाद ।
स्नानपान लहि बन्धु सब, पंडित पाय सुवाद ॥३॥

देवता, भलेमानुष और बाप ये तीन स्वभाव देखकर प्रसन्न होते हैं। भाई वृन्द स्नान और पान से तथा वाक्य पालन से पण्डित लोग खुश होते हैं ॥३॥

आयुः कर्म च वित्तञ्च विद्या निधनमेव च ।
पञ्चैतानि च सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः ॥४॥

दोहा— आयुर्बल धन कर्म औ, विद्या मरण बनाय ।
पाँचो रहते गर्भ में, जीवन के रचि जाय । ४॥

आयु, कर्म, सम्पत्ति, विद्या और मरण ये पाँच बातें तभी तय हो जाती हैं, जब कि मनुष्य गर्भ में ही रहता है ॥४॥

अहो बत ! विचित्राणि चरितानि महात्मनाम् ।
लक्ष्मीं तृणाय मन्यन्ते तद्भारेण नमन्ति च ॥५॥

दोहा— अचरज चरित विचित्र अति, बड़े जनन के आहि ।
जो तृण सम सम्पति मिले, तासु भार नै जाहिं ॥५॥

अहो ! महात्माओं के चरित्र भी विचित्र होते हैं। वैसे तो ये लक्ष्मी को तिनके की तरह समझते हैं। और जब वह आ ही जाती हैं तो इनके भार से दबकर नम्र हो जाते हैं ॥५॥

चाणक्यनीतिदर्पणः ९५

यस्य स्नेहो भयं तस्य स्नेहो दुःखस्य भाजनम् ।
स्नेहमूलानि दुःखानि तानि त्यक्त्वा वसेत्सुखम् ॥ ६॥
दोहा–जाहि प्रीति भय ताहिको, प्रीति दुःख को पात्र ।
प्रीति मूल दुख त्यागि के, बसै तब सुख मात्र ॥६॥
जिसके हृदय में स्नेह (प्रीति) है, उसको भय है। जिसके पास स्नेह है, उसको दुःख है। जिसके हृदय में स्नेह है, उसी के पास तरह-तरह के दुःख रहते हैं, जो इसे त्याग देता है वह सुख से रहता

अनागतविधाता च प्रत्युत्पन्नमतिस्तथा ।
द्वावेतौ सुखमेधेते यद्भविष्यो विनश्यति ॥ ७ ॥
दोहा–पहिलहिं करत उपाय जो, परैंहु तुरत जेहि सूझ ।
दुहुन बढ़त सुख मरत जो, होनी गुणत असूझ ॥७॥
जो मनुष्य भविष्य में आनेवाली विपत्तिसे होशियार है और जिसकी बुद्धि समय पर काम कर जाती है ये दो मनुष्य आनन्द से आगे बढ़ते जाते हैं। इनके विपरीत जो भाग्य में लिखा होगा वह होगा, जो यह सोचकर बैठनेवाले हैं, उनका नाश निश्चित है।

राज्ञधर्मणि धर्मिष्ठाः पापे पापाः समे समाः ।
राजानमनुवर्तन्ते यथा राजा तथा प्रजाः ॥ ८ ॥
दोहा–नृप धरमी धरमी प्रजा, पाप पाप मति जान ।
सम्मत सम भूपति तथा, परगट प्रजा पिछान ॥८॥


१. 'राज्ञि धर्मिणि' इत्यपि पाठः ।

९६ चाणक्यनीतिदर्पणः

राजा यदि धर्मात्मा होता है तो उसकी प्रजा भी धर्मात्मा होती है, राजा पापी होता है तो उसकी प्रजा भी पापी होती है। सम राजा होता है तो प्रजा भी सम ही होती है। कहने का भाव यह कि सब राजा का ही अनुसरण करते हैं। जैसा राजा होगा, उसकी प्रजा भी वैसी ही होगी ॥८॥

जीवन्तं मृतवन्मन्ये देहिनं धर्मवर्जितम् । मृतो धर्मेण संयुक्तो दीर्घजीवी न संशयः ॥ ९ ॥

दोहा--जीवन ही समुझैँ मरेउ, मनुजहिं धर्म विहीन । नहिं संशय निरजीव सो, मरेउ धर्म जेहि कीन ॥९॥

धर्मविहीन मनुष्य को मैं जीते मुर्दे की तरह मानता हूँ। जो धर्मात्मा था, पर मर गया तो वह वास्तव में दीर्घजीवी था ॥९॥

धर्मार्थकाममोक्षाणां यस्यैकोऽपि न विद्यते । अजागलस्तनस्येव तस्य जन्म निरर्थकम् ॥१०॥

दोहा--धर्म, अर्थ, अरु, मोक्ष, न एको है जासु । अजाकंठ कुचके सरिस, व्यर्थ जन्म ह तासु ॥१०॥

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार पदार्थों में से एक पदार्थ भी जिसके पास नहीं है, तो बकरी के गले में लटकने-वाले स्तनों के समान उसका जन्म ही निरर्थक है ॥१०॥

दह्यमानाः सुतीव्रेण नीचाः परयशोऽग्निना । अशक्तास्तत्पदं गन्तुं ततो निन्दां प्रकुर्वते ॥११॥

७ चाणक्यनीतिदर्पणः ९७

दोहा-और अगिन यश दुसह सो, जरि जरि दुर्जन नीच । आप न तैसी करि सकैं, तब तिहिं निन्दहिं बीच ॥११॥

नीच प्रकृति के लोग औरों के यशरूपी अग्नि से जलते रहते हैं उस पद तक तो पहुँचने की सामाथ्र्य उनमें रहती नहीं। इसलिए वे उसकी निन्दा करने लग जाते हैं ॥११॥

बन्धाय विषयासङ्गं मुक्त्यै निर्विषयं मनः । मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ॥१२॥

दोहा-विषय सङ्ग परिबन्ध है, विषय हीन निर्वाह । बंध मोक्ष इन दुहुंन को, कारण मनै न आन ॥१२॥

विषयों में मन का, लगाना ही बन्धन है और विषयों से मन को हटाना ही मुक्ति है । भाव यह कि मन ही मनुष्यों के बन्धन और मोक्ष का हेतु है ॥१२॥

देहाभिमानगलिते ज्ञानेन परमात्मनः । यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र समाधयः ॥१३॥

दोहा-ब्रह्मज्ञान सो देह को, विगत भये अभिमान । जहाँ जहाँ मन जात है, तहाँ समाधिहिं जान ॥१३॥

परमात्मज्ञान से मनुष्य का जब देहाभिमान गल जाता है तो फिर जहाँ कहीं भी उसका मन जाता है तो उसके लिए सर्वत्र समाधि ही है ॥१३॥

ईप्सितं मनसः सर्वं कस्य सम्पद्यते सुखम् । दैवायत्तं यतः सर्वं तस्मात् संतोषमाश्रयेत् ॥१४॥

९४ चाणक्यनीतिदर्पणं।

दोहा—इच्छित सब सुख केहि मिलत, जब सब दैवाधीन यहि ते संतोषहिं शरण, चहैं चतुर कहँ कीन ॥१४॥

अपने मन के अनुसार सुख किसे मिलता है। क्योंकि संसार का सब काम दैव के अधीन है। इसलिये जितना सुख प्राप्त हो जाय, उतने में ही सन्तुष्ट रहो ॥१४॥

यथा धेनुसहस्रेषु वत्सो गच्छति मातरम् । तथा यच्च कृतं कर्म कर्तारमनुगच्छति ॥१५॥

दोहा—जैसे धेनु हजार में, वत्स जाय लखि मात । तैसे ही किन्हें करम, करतहिं के ढिग जात ॥१५॥

जैसे हजारों गौओं में बछड़ा अपनी ही माँ के पास जाता है। उसी तरह प्रत्येक मनुष्य का कर्म ( भाग्य ) अपने स्वामी के ही पास जा पहुँचता है ॥१५॥

अनवस्थितकार्यस्य न जने न वने सुखम् । जनो दहति संसर्गाद्वनं संगविवर्जनात् ॥१६॥

दोहा—अनथिर कारज ते न सुख, जन औ वन दुहुँ माहिं । जन तेहि दाहै, सङ्ग ते, वन असंग ते दाहि ॥१६॥

जिसका कार्य अव्यवस्थित रहता है उसे न समाज में सुख है, न वन में। समाज में वह संसर्ग से दुःखी रहता है तो वन में संसर्ग त्याग से दुखी रहेगा ॥१६॥

यत् खनित्वा खनित्रेण भूतले वारि विन्दति । तथा गुरुगतां विद्यां शुश्रूषुरधिगच्छति ॥१७॥

चाणक्यनीतिदर्पणः ९९

दोहा—जिमि खोदत ही ते मिले, भूतल के मधि वारि ।
तैसेहि सेवा के किये, गुरु विद्या मिलि धारि ॥१७.।

जैसे फावड़े से खोदने पर पृथ्वी से जल निकल आता है । उसी तरह किसी गुरु के पास विद्यमान विद्या उसकी सेवा करने से प्राप्त हो जाती है ॥१७ ॥

कर्मायत्तं फलं पुंसां बुद्धिः कर्मानुसारिणी ।
तथाऽपि सुधियश्चार्या सुविचार्यैव कुर्वते ॥१८॥

दोहा—फलसिधि कर्म अधीन है, बुद्धि कर्म अनुसार ।
तौहू सुमति महान जन, करम करहिं सुविचार ॥१८॥

यद्यपि प्रत्येक मनुष्य को कर्मानुसार ही फल प्राप्त होता है और बुद्धि भी कर्मानुसार ही बनती है । फिर भी बुद्धिमान् लोग अच्छी तरह समझ-बूझ कर ही कोई काम करते हैं ॥१८॥

एकाक्षरप्रदातारं यो गुरुं नाऽभिवन्दते ।
श्वानयोनिशतं भुक्त्वा चांडालेष्वभिजायते ॥१९॥

दोहा—एक अक्षरदातुहु गुरुहि, जो नर वन्दे नाहिं ।
जन्म सैकड़ों श्वान ह्वै, जनै चण्डालन माहिं ॥१९॥

एक अक्षर देनेवाले को भी जो मनुष्य अपना गुरु नहीं मानता तो वह सैकड़ों बार कुत्ते की योनि में रह-रह कर अन्त में चाण्डाल होता है ॥१९॥

१००चाणक्यनीतिदर्पणः

युगान्ते प्रचलेन्मेरुः कल्पान्ते सप्त सागराः ।
साधवः प्रतिपन्नार्थान्न चलन्ति कदाचन ॥२०॥

दोहा—सात सिन्धु कल्पान्त चलु, मेरु चलै युग अन्त ।
परे प्रयोजन ते कबहुँ, नहिं चलते हैं सन्त ॥२०॥

युग का अन्त हो जाने पर सुमेरु पर्वत डिग जाता है । कल्प का अन्त होने पर सातो सागर भी चंचल हो उठते हैं, पर सज्जन लोग स्वीकार किये हुये मार्ग से विचलित नहीं होते ॥२०॥

पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि अन्नमापः सुभाषितम् ।
मूढैः पाषाणखण्डेषु रत्नसंख्या विधीयते ॥२१॥

म०छ०--अन्न बारि चारु बोल तीनि रत्न भू अमोल ।
मूढ़ लोग के पषान टूक रत्न के पषान ॥२१ ॥

सच पूछो तो पृथिवी भर में तीन ही रत्न हैं--अन्न, जल और मीठी-मीठी बातें । लेकिन बेवकूफ लोग पत्थर के टुकड़ों को ही रत्न मानते हैं ॥२१॥

इति चाणक्ये त्रयोदशोऽध्यायः ॥१३॥


अथ चतुर्दशोऽध्यायः ॥१४॥

आत्मापराधवृक्षस्य फलान्येतानि देहिनाम् ।
दारिद्र्य-रोग-दुःखानि बन्धनव्यसनानि च ॥१॥