चाणक्य नीति दर्पण (भाषा टीका सहित)
Chanakya Niti Darpan Hindi
आचार्य चाणक्य / कौटिल्य द्वारा
स्रोत: Chanakya Niti Darpan with Shlokas and Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचाणक्यनीतिदर्पणः
आतुरे व्यसने प्राप्ते दुर्भिक्षे शत्रुसंकटे । राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः ॥१२॥ दोहा—दुख आतुर दुरभिक्ष में, अरि जय कलह अभङ्ग । भूपति भवन मसान में, बन्धु सोई रहे सङ्ग ॥१२॥ जो बीमारी में, दुख में, दुर्भिक्ष में, शत्रु द्वारा किसी प्रकार का सङ्कट उपस्थित होनेपर, राजद्वार में और श्मशान पर जो ठीक समय पर पहुँचता है, वही बान्धव कहलाने का अधिकारी है॥१२॥
यो ध्रुवाणि परित्यज्य ह्यध्रुवं परिषेवते । ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति अध्रुवं नष्टमेवहि ॥१३॥ दोहा—ध्रुव कूँ तजि अध्रुव गहै, चित्तमैं अति सुख चाहि । ध्रुव तिनके नाशत तुरत, अध्रुव नष्ट ह्वै जाहि ॥१३॥ जो मनुष्य निश्चित वस्तु को छोड़कर अनिश्चित की ओर दौड़ता है तो उसकी निश्चित वस्तु भी नष्ट हो जाती है और अनिश्चित तो मनो पहले ही नष्ट थी ॥१३॥
वरयेत्कुलजां प्राज्ञो विरूपामपि कन्यकाम् । रूपशीलां न नीचस्य विवाहः सदृशे कुले ॥१४॥ दोहा—कुल जातीय विरूप दोउ, चतुर वर करि चाह । रूपवती तउ नीच तजि, समकुल करिय विवाह ॥१४॥ समझदार मनुष्य का कर्त्तव्य है कि वह कुरुपा भी कुलवती कन्या के साथ विवाह कर ले, पर नीच सुरूपवती के साथ न करे ।