चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्व० श्री मोतीचन्द जी हीरावत की पुण्य स्मृति में सादर भेंट. अनुशीलन हिन्दी साहित्य का इतिहास प्रस्तुत करनेका कार्य फ्रेंच विद्वान गार्साँ द तासी और अँगरेज विद्वान ग्रियर्सनने आरम्भ किया और उसका स्वरूप रामचन्द्र शुक्ल ने अपने हिन्दी साहित्यका इतिहास द्वारा स्थिर किया। किन्तु इन तीनों ही विद्वानों की पुस्तकों में मौलाना दाऊद अथवा उनकी कृति चन्दायतका कोई उल्लेख नहीं है। स्पष्ट है रामचन्द्र शुक्लके समयतक उनके सम्बन्धमें कोई जानकारी उपलब्ध न थी। मौलाना दाऊदका परिचय सर्व प्रथम १९२८ ई (वि सं १९७) में मिश्रबन्धुने अपने मिश्रबन्धु-विनोद द्वारा दिया। उन्होंने अपने ग्रन्थके आदि प्रकरणमें बताया कि मुल्ला दाऊद अमीर खुसरोका समकालीन था। उसका कविता काल संवत् १३८५ के लगभग था। इसने नूरक और चन्दाकी प्रेम कथा हिन्दीमें रची। यह ग्रन्थ हमारे देखनेमें नहीं आया।१ मिश्रबन्धुकी इस सूचनाका आधार क्या था, यह उन्होंने नहीं बताया। सात वर्ष पश्चात् हरिऔधका हिन्दी भाषा और उसके साहित्यका विकास प्रकाशित हुआ। उसमें दाऊदके सम्बन्धमें ये पंक्तियाँ हैं—अमीर खुसरोका समकालीन एक और मुल्ला दाऊद नामक ब्रजभाषाका कवि हुआ। कहा जाता है कि उसने नूरक एवं चन्दाकी प्रेमकथा नामक दो हिन्दी पद्य ग्रन्थोंकी रचना की। किन्तु ये दोनों ग्रन्थ अप्राप्यसे हैं। इसलिए इनकी रचनाकी भाषाके विषयमें कुछ लिखना असम्भव है। मिश्रबन्धुकी तरह ही हरिऔधने भी अपनी सूचनाका आधार नहीं दिया है। उस समय जान पड़ता है हिन्दीमें सन्दर्भ देनेकी परिपाटी नहीं थी। जो भी हो उनके शब्दोंसे यह स्पष्ट झलकत्ता है कि मिश्रबन्धु के अतिरिक्त उनकी जानकारीका कोई अन्य साधन नहीं था। उन्होंने मिश्रबन्धुसे भिन्न दो नयी बातें अवश्य कहीं—(१) दाऊदने नूरक और चन्दा नामक दो ग्रन्थोंकी रचना की। (२) वे ब्रजभाषाके कवि थे। किन्तु ये दोनों ही बातें उनकी कल्पना प्रसूत हैं यह तनिक ध्यान देनेसे ही स्पष्ट हो जाता है। दाऊदके ब्रजभाषा के कवि होनेकी बातका खण्डन उनकी अपनी ही पंक्तियोंसे हो जाता है। वे उन्हें 'ब्रज भाषाका कवि' कहते हैं; फिर उनके हिन्दी पद्य ग्रन्थोंकी बात करते हैं और अन्तमें १. मिश्रबन्धु विनोद, प्रथम भाग सं १९७१ पृ २४० । २. हिन्दी भाषा और उसके साहित्यका विकास पटना, द्वितीय संस्करण, सं १९९७ पृ २४७ ।