भारतकोश
चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

DevanagariAwadhipublished520 पृष्ठ

पृष्ठ 11, कुल 520 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 11

यह भी कहते हैं कि उसकी भाषाके विषयमें कुछ लिखना असम्भव है। कारण यह कि उन्हें दाऊदकी भाषाके सम्बन्धमें कोई जानकारी न थी। दो ग्रन्थोंकी कल्पनाका आधार तो स्पष्ट ही है। उसके सम्बन्धमें कुछ कहना अपेक्षित नहीं। १९३६ ई में हिन्दीका पहला शोध निबन्ध पीताम्बरदत्त बड़थ्वालकृत 'द निर्गुण स्कूल ऑफ हिन्दी पोएट्री' प्रकाशित हुआ। उन्होंने दाऊदकी चर्चा इन शब्दोंमें की—सबसे पुराना ज्ञात प्रेमाख्यानक कवि मुल्ला दाऊद मालूम होता है। जो अलाउद्दीनके राज्यकाल वि० सं० १४९७ (१४३९ ई०) के आसपास विद्यमान था। परन्तु मुल्ला दाऊद भी आदि प्रेमाख्यानक कवि था या नहीं कह नहीं सकते। उसकी नूरक-चन्दाकी कहानीका हमें नाम ही मालूम है।' आधुनिक पद्धतिसे शोध-निबन्ध प्रस्तुत करते हुए भी बड़थ्वाल ने पुरानी परिपाटीका ही अनुसरण किया और कोई सन्दर्भ नहीं दिया जिससे उनके कथनका सूत्र जाना जा सके। उनके कथनमें मिश्रबन्धु से इतनी ही भिन्नता है कि उन्होंने दाऊदका अस्तित्व अलाउद्दीन खिलजीके समयमें बताया और उनका समय वि सं १४९७ दिया। देखनेमें यह बात नयी और महत्वपूर्ण जान पड़ती है क्योंकि इसके अनुसार दाऊदका समय मिश्रबन्धुओंके बताये समयसे सौ बरससे अधिक पीछे ठहरता है। किन्तु ध्यानसे देखनेपर बड़थ्वालके इस कथनका ऐतिहासिक विरोध स्पष्ट झलक उठता है। वि सं १४९७ (१४३९ ई ) में अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली- के तख्तपर न विराज कर स्वर्गके दरबारमें हाजिरी दे रहा था। उस समय दिल्लीमें सैयदवंशीय सुल्तान मुबारिकशाह (द्वितीय)का शासन था। इस तिथिके अनुसार दाऊद आदि प्रेमाख्यानक कवि नहीं ठहरते। कुतबनकी मिरगावती इस तिथिसे पहलेकी रचना है। यह जानकारी रामचन्द्र शुक्ल बहुत पहले दे चुके थे। यह बात बड़थ्वालको ज्ञात न रही हो यह बुद्धिग्राह्य नहीं है। अतः अधिक सम्भावना इस बातकी है कि बड़थ्वाल ने अपने मूल निबन्ध में दाऊदके लिए अलाउद्दीनकी सम सामयिक ही कोई तिथि (वि सं १३५४-१३७४ अर्थात् १२९६-१३१६१ के बीच) दी होगी। हो सकता है कि किसीके प्रमादसे प्रकाशित ग्रन्थ में १३९७ ई में वि सं १४९७ का रूप दे दिया हो। तथ्य जो हो तिथिका किसी प्रकार समाधान कर लेने पर भी प्रश्न उठता है कि बड़थ्वालको दाऊद और अलाउद्दीनकी समसामयिकताका ज्ञान कैसे हुआ। इसका भी उत्तर कठिन नहीं है। अलाउद्दीन और अमीर खुसरोकी समसामयिकता प्रसिद्ध ही है। अतः बथ्वालने मिश्रबन्धुके तथ्यपर प्रहार कर अपनी शोध-बुद्धिका उपयोग किया और खुसरोकी जगह अलाउद्दीनका नाम लेकर मिश्रबन्धुकी बातको नया रूपमें कह दिया। बड़थ्वालके शोध निबन्धके पश्चात् १९३८ ई में रामकुमार वर्माका शोध निबन्ध 'हिन्दी साहित्यका आलोचनात्मक इतिहास' प्रकाशमें आया। राम हिन्दी काव्यमें निर्गुण सम्प्रदाय सं २ क, पृष्टक्र, १ ०-११ ।