चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकुमार वर्मांने अपने मूल निबन्धमे दाऊदके सम्बन्धमें क्या लिखा था, यह तो हमारे सामने नहीं है, किन्तु उसके प्रकाशित रूपका जो दूसरा संस्करण उपलब्ध है, उसमें कहा गया है कि खुसरोका नाम जब समस्त उत्तरी भारतमें एक महान् कविके रूपमें फैल रहा था, उसी समय मुल्ला दाऊदका नाम भी हिन्दी साहित्यके इतिहासमें आता है । मुल्ला दाऊदकी एक प्रेम कहानी प्रसिद्ध है, उसका नाम है चन्दायन या चम्पावत । यह ग्रन्थ अभीतक अप्राप्य है और इसके सम्बन्धमें कुछ भी प्रमाणित रूपसे ज्ञात नहीं है ।¹ साथ ही उन्होंने दाऊदको अलाउद्दीन खिलजीका समकालीन मानते हुए उनका कविता-काल वि सं० १३७५ (१३१७ ई ) ठहराया । अपने पूर्ववर्तियोंके समान ही रामकुमार वर्मांने भी अपनी सूचनाका सूत्र बतानेकी आवश्यकता नहीं समझी । पर देखनेसे लगता है कि उन्होंने मिश्रबन्धु और बर्वेवालके कथनको ही जोड़कर अपने शब्दोंमे रख दिया है । उनकी यह सूचना अवश्य नयी है कि दाऊदकी पुस्तकका नाम चन्दायण या चम्पावत था । किन्तु प्रमाणाभावमें यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उनके पास मिश्रबन्धु और बथेंवालके कथनके अतिरिक्त अपना कोई निजी सूत्र भी था । हो सकता है, यह बात पीछे ज्ञात तथ्योंके आधारपर प्रस्तुत संस्करणमें जोड दी गयी हो । मूल सूत्रोंके अभावमें इन विद्वानोंके कथनका शोधकी दृष्टिसे कोई महत्त्व नहीं है । दाऊदके सम्बन्ध में साधार कुछ कहनेका प्रयत्न पहली बार ब्रजरत्नदासने १९४० ई (वि सं १९९८) में किया । उन्होंने अपनी पुस्तक खड़ी बोली हिन्दी साहित्यका इतिहासमें मुग़लकालके सुप्रसिद्ध इतिहासकार अब्दुलक़ादिर बदा- यूनी कृत मुन्तखब उत्-तवारीखमें उल्लिखित इस तथ्यकी ओर ध्यान आकृष्ट किया कि दाऊदके चन्दायन की रचना फ़ीरोज शाह तुगलक (१३५१-१३८८ ई )के शासन कालमें हुई थी। बदायूनीका कथन इस प्रकार है :—सन् ७७२ (हिजरी) (१३७० ई०)में वजीर खानजहाँकी मृत्यु हुई और उनका जौनाशाह नामक पुत्र उसी पद पर प्रसिद्ध हुआ और उसी के नाम से मौलाना दाऊदने चन्दायन (चन्धावन) को, जो हिन्दवी भाषाका एक मसनवी है, जिसमें लोरक (नूरक) और चन्दा नामक प्रेमी-प्रेमिकाका वर्णन है और वास्तविक अनुभवसे परिपूर्ण हैं पद्यबद्ध किया। इस देशमें अत्यंत प्रसिद्ध होनेके कारण उसकी (चन्दायन) प्रशंसा अपेक्षित नहीं है। दिल्लीमें मखदूम शेख तक़ीउद्दीन वायज रब्बानी इसके कुछ सार्थक पद्य मेंबर (व्यास पीठ) से पढ़ा करते थे और उनके सुननेका लोगोंपर विशेष प्रभाव पड़ता था। उस समयके कुछ विद्वानोंने शेखसे पूछा कि इस हिन्दवी मसनवी के अपनाने का कारण क्या है तो उन्होंने उत्तर दिया कि यह लोक (सृष्टि)के समस्त तत्त्वों तथा अर्थोंसे युक्त है तथा प्रेम और भक्ति के जिज्ञासु लोगोंके उपयुक्त है। (उसमें) कुरानके १ हिन्दी साहित्यका आलोचनात्मक इतिहास, प्रयाग, द्वितीय संस्करण १९५४ ई पृ १२१। २ खड़ी बोली हिन्दी साहित्यका इतिहास काशी, सं १९९८ पृ १४-१५।