चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१११ ५७-६५ ( अप्राप्य ) [ सम्भवतः यहाँ शेष नौ महीनों का वर्णन नौ कड़बकों में रहा होगा । ] ६६ ( बम्बई २१ ) आमदने बाज़िर दर गोचर व शुनिदन बजारे कस पौंद व दीदन व आशिक शुदन व उफ़्तादन ( गोचर में बाज़िर का आना और चाँद के महुक के नीचे से जाना और उसे देख कर मोहित होकर मूर्च्छित होना ) बाज़िर एक फिर्तेंहुत आवा । गोचर फिरै बिहाऊ गावा ॥१ घर घर सुगुति माँग लै खाई । खिन खिन राजदुआरिहिँ जाइ ॥२ दिन एक चाँद मौरहर ठाढ़ी । झाँकसि माँध झरोखा फाड़ी ॥३ तिह खन बाज़िर मूँड़ उघावा । देखसि चाँद झरोखें आवा ॥४ देखतहिँ जनु नौहारहिँ लीन्हा । बिदका चाँद झरोखा दीन्हा ॥५ धरहुत जीउ न आनै फिरगा, काया भई बिनु साँस ।६ नैन नीर दइ मुँह छिरकहिँ, आय लोग तिहिँ पास ॥७ टिप्पणी—(१) बाज़िर—वज्रपानी योगी । बिहाऊ—बिहाग । (२) सुगुति—मुक्ति भोजन । (३) माँध—हर । झरोखा—(स चक गवाक्ष) महल का वह स्थान या गोपुर जहाँ बैठ कर राजा प्रजा को दर्शन देते या महल से बाहर देखते थे; खिड़की । फाड़ी—निगाह कर । (४) मूँड़—सर । उघावा—ऊँचा किया ऊपर उठाया । (५) नौहारहिँ—डर कर जी उठने को नौहार लेना कहते हैं । बिदका— बन्द कर दिया । ६७ ( रीईंग्स ३७ ) परसीदने ख़ल्क बाज़िर रा अज हाले बेहोशी ( बाज़िर की मूर्च्छा सुन कर जनता का आना ) कहु बाज़िर तोर बेदन काहा । लोग महाजन पूछत आहा ॥१ पीर कहसि तू मँह पिनानी । औखद मूर देहुँ तिहिँ आनी ॥२