चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंधाऊ रँगने आदिके काममं आती है। कौपर—चौड़ा, किन्तु कम गहरा कटोरेके आकारका पात्र, जो शुभ अवसरोंपर प्रयोग होता है। अग्रबाल जातिमें इसका प्रयोग विशेष रूपसे कन्यादानके समय किया जाता है। (३) सुहारी—जिसे सामान्यतः पूड़ी (पूरी) कहते हैं वह अवध और भोजपुर में सोहारी कही जाती है। यहाँ उसी से तात्पर्य है। पर कहीं कहीं आटे को बेल कर धूप में सुखाने के पश्चात् घी में तली हुई पूरी को सोहारी कहते हैं। (७) अअथाह—अगाध।
९० (सीरियम ५१भ) खिरतै पुहुप चौंदा गाबद (पीठ वर्नन) धारहिं धाउ पीठ बैसारी। गढ़ी बनाइ साँचे डारी ॥१ कर चूर हीर पात क दोषा। पीठ ठाँउ सहज दुइ मोषा ॥२ तक पार जस देह न आयइ। चाँदु चीर मँह मरम दिखायइ ॥३ परै लंक सिगेरै घनों। और तक पातर कर गुनों ॥४ फूँकहि टूट हाइ दुइ आधा। नैन देख मन उपजै साधा ॥५ मूरग हाइ जो तरै न साने, धाई परैर पाठ ।६ कर गुन भय पीठ भा, दूसस फाड़ा राउ ॥७
९१ (सीरियम ५१ ब; पंजाब [८१]) खिरतै गनदा ब छनार बाँदा गबद (आपु र्ब चाक बर्नन) फदरी कम्म दाइ चीर पहिराय। चाँद मलन अपुरुप पर' लाये ॥१ आ गगनान दीग अगि पाग। दए त्रिषाइ मेरंग पैंताग ॥२ दगे फम्म मार मन सम लागा। मरभँ घरउँ गान कें नाँगा ॥३