चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२९ मूलपाठ—(४) सो सोइ । पाठांतर—पंजाब प्रति— इस प्रतिफ़ उपलब्धमे फोटोमें लाल स्याहीसे लिखी पंक्तियों अत्यन्त अस्पष्ट हैं । जिससे शीर्षक, और पंक्ति १, ६ और ७ का पाठ प्राप्त करना सम्भव नहीं है । १—मुर्कीना २—अरु ३—चकिया ४—जोगवई ५—मदिर ६—सष्ट ७—पाता ८—गुजराता ९—चंदोवा १०—आवा बब्वल । टिप्पणी—( १ ) कुंदिवा—इसका उल्लेख पदमावत ( ३२१।२ ) में भी है । यहाँ वासुदेव शरण अग्रवालने उसका फूँदने लगा हुआ नीवीबन्ध होनेकी सम्भावना प्रकट की है । किन्तु प्रस्तुत प्रसंगमें यह अनुमान संगत नहीं है । हमारी समझम यह किसी प्रकारका अंगिया या चोली है । अथवा यह पद्मनाभ कृत कान्हडदे प्रबन्धमें उल्लिखित फूँदड़ी ( ३।१५३ ) है । फूँदड़ी किसी प्रकारका मूल्यवान वस्त्र या किस्म होने और रत्नोंका प्रयोग होता था ( कनक मुकामल फूँन्दड़ी ए बिचि रत्न बहन्त ) । मॅहूरिया—सिंदूरी रंगकी । सारी—साड़ी । ( २ ) मघवर्णा—पदमावतमें मघीनारा ( १६९।४ ) और पृथ्वीचन्द्र चरितम मेघनादा उल्लेख है ( प्राचीन गुर्जर काव्य संग्रह बड़ोदा १९ पृ १२ ) । सम्भवतः यह वही वस्त्र है जिसे ज्योतिरीश्वर ठाकुरने अपने वर्णरत्नाकरमें मेघपत्र और मेघडम्बर नामसे पट्टवस्त्र जातिका उल्लेख किया है । चौदहवीं शतीक विविधकल्पक्रम भी मेघडम्बर, मेघाडम्बर और मेघावली नामक वस्त्रोंका उल्लेख है ( वणिक समुच्चय सम्पादक श्री जै० संडसरा पृ १४-१५)। मेघडम्बर साटियोंका उल्लेख प्राचीन बगला साहित्यमें भी प्राय मिलता है । इन सबसे अनुमान होता है कि यह आसमानी ( बादली ) रंगका कोई रेशमी वस्त्र रहा होगा । कधियारा—इस पाठके सम्बन्धमें कुछ निश्चित नहीं कहा जा सकता । इसे कथारा या गथारउ भी पढ़ा सकता है । पर इन नामोंके किसी वस्त्रकी जानकारी कहीं प्राप्त नहीं है । चकया—पद्मावतमें भी इसका उल्लेख है (११.३४) । (यहाँ रमऊ गगार्दजीने उसे चिकवा चुना है । यह पाठ सम्भव है पर हमने उस पाठ भूलकर ग्रहण नहीं किया है ।) रामचन्द्र शुक्लने इस चौकट नामक रेशमी वस्त्र बताया है। वर्णरत्नाकर अनुसार विवाहमें नेगके रूपमें निम्न जातियोंको चमडा चौकट करते थे । चकयाका उल्लेख यहाँ विवाहके अवसरपर दिये जाने वाले वस्त्रके प्रसंगमें नहीं है। अतः उस चौकटसे इस वस्त्रकी सही पहचान न सकता । यह वस्त्र किसी विशिष्ट रूपमें बनाया होगा। शुक्लजीने उसे गहरा