चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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था और उसमें किन छन्दोंका प्रयोग हुआ था।१ मुन्तखब के ग्रन्थके प्रकाश- में आ जानेके बाद दाऊदके समयके सम्बन्धमें जो मिथ्या धारणाएँ फैली थीं उनका निराकरण हो जाना चाहिए था। पर परशुराम चतुर्वेदीने उसका विचित्र अर्थ लगा कर एक नया भ्रम प्रस्तुत कर दिया। कदाचित् उन्होंने मिश्रबन्धु और रामकुमार वर्माके कथनके साथ मुन्तखबके कथनका सम्बन्ध करनेका प्रयत्न किया। १९५१ ई. में कमल कुलश्रेष्ठका शोध निबन्ध हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्य प्रकाशित हुआ। इस ग्रन्थमें उन्होंने पूर्व ज्ञात उपर्युक्त अधिकांश सूचनाओं को जो उन्हें उपलब्ध हो सकीं एकत्र कर बदायूनीके कथनपर बल देते हुए मत प्रकट किया कि चन्दायत का रचनाकाल वि० सं० १४७७ के निकट था। किन्तु इस ग्रन्थमें दी गयी महत्वकी सूचना यह है कि चन्दायत की कोई प्रामाणिक प्रति अभी- तक नहीं मिल सकी। एक अप्रमाणित-सी प्रति डा० धीरेन्द्र वर्मा ने अवश्य देखी है। परन्तु उसे वे कुछ कारणोंसे विशेष ध्यानपूर्वक नहीं देख सके और इस काव्यके सम्बन्धमें कुछ निश्चयपूर्वक बतलानेमें असमर्थ हैं।२ पाद टिप्पणीमें इस सम्बन्धमें कुछ अतिरिक्त सूचना भी है जो इस प्रकार है—बीकानेरके श्री पुरुषोत्तम शर्माके पास इस ग्रन्थकी एक प्रति है। शर्माजीने यह पोथी एक सज्जन द्वारा प्रयाग भेजी थी, परन्तु उन्होंने पोथीकी परीक्षा अच्छी तरह धीरेन्द्र वर्माको नहीं करने दी।३ कुलश्रेष्ठकी इस पादटिप्पणीके अतिरिक्त अन्य सूत्रसे भी इस प्रतिके सम्बन्धमें हमें जो जानकारी प्राप्त हुई है उससे भी ज्ञात होता है कि धीरेन्द्र वर्मा ने उसकी प्रामाणिकतामें सन्देह प्रकट किया था। धीरेन्द्र वर्मा ने इस प्रतिको चाहे जिस भी दृष्टिसे देखा हो चन्दायतकी किसी प्रकारकी प्रतिके अस्तित्वका ज्ञान भी अपने आपमें महत्वका था। परवर्ती अनुसन्धित्सुओंका ध्यान इस ओर जाना चाहिए था। खेद है किसीने इस ओर ध्यान नहीं दिया। १९५५ ई. में प्रेमाख्यानक काव्य और हिन्दी सूफी साहित्यसे सम्बन्ध रखनेवाले तीन ग्रन्थ प्रायः एक साथ ही प्रकाशित हुए। ये तीनों ही ग्रन्थ शोध-निबन्ध हैं जो विभिन्न विश्वविद्यालयोंके समक्ष पी एच०डी की उपाधिके निमित्त प्रस्तुत किये गये थे। ये हैं—हरिकान्त श्रीवास्तव कृत भारतीय प्रेमाख्यानक काव्य विमलकुमार जैन कृत सूफी मत और हिन्दी साहित्य और सरला शुक्ल कृत जायसीके परवर्ती हिन्दी सूफी कवि। विषयकी दृष्टिसे श्रीवास्तवके ग्रन्थका विस्तार सबसे अधिक है। उसमें दाऊदके ग्रन्थके सम्बन्धमें विशेष रूपसे और विस्तृत जानकारी की अपेक्षा की जाती है; किन्तु श्रीवास्तवकी जानकारी इस बाततक ही सीमित है कि सर्व प्रथम मुल्ला दाऊदकी नूरक चन्दा कहाणीके बाद कुतबनकी मृगावती मिली।४ १. वही काव्य संग्रह, प्रयाग, (द्वितीय संस्करण) सं. न. १३ पृ. ६१-६३। २. हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्य, आग्रा, १९५१ ई. पृ. ८। ३. वही, पृ. ८, पा० टि. १। ४. भारतीय प्रेमाख्यानक काव्य, काशी, १९५५ ई. पृ. २२।