चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
पृष्ठ 18, कुल 520 में से
संदर्भ में पढ़ेंसरला शुक्लके शोध-निबन्धकी परिधिमें दाऊद नहीं आते। यदि उन्होंने उनके सम्बन्धमें एक शब्द भी न लिखा होता तो कोई आश्चर्यकी बात न होती, पर आश्चर्य तो यह देखकर होता है कि दाऊदके लिए उन्होंने एक लम्बा पैराग्राफ व्यय किया है।¹ फिर भी उसमें पूर्वके शोधोंसे ज्ञात तथ्योंकी कोई चर्चा नहीं है। उनकी दृष्टिमें रामकुमार वर्माका कथन बदायूनीके कथनसे अधिक महत्त्व रखता है। शुक्लजीके कथनका उद्धृत करना उनको अनावश्यक महत्त्व देना होगा। विमल- कुमार जैनने अपने निबन्धमें सरला शुक्लकी तरह विस्तारमें न जाकर, दाऊदके लिए दो-तीन पंक्तियाँ पर्याप्त माना है और उनमें उन्होंने रामकुमार वर्माके कथनको दुहरा भर दिया है।² इन शोध-निबंधोंके प्रकाशनसे अनेक वर्ष पूर्व वि. सं. २ ० ० ६ (१९५०-५१) में अगरचंद नाहटाने नागरी प्रचारिणी पत्रिका में 'मिश्रबन्धु-विनोदकी भूलें' शीर्षक एक लेख प्रकाशित किया था जिसमें मिश्रबन्धु के दाऊद सम्बन्धी कथन की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए उन्होंने सूचना दी थी कि रावतमल सारस्वत को मूरक-चन्दाकी प्रेम कहानीकी एक प्रति मिली है और उस प्रतिके एक कड़वकके अनुसार चन्तायनकी रचना ७८१ हिजरीमें हुई थी।³ इस प्रकार १९५५ ई. से बहुत पूर्व, जब कि ये सभी निबन्ध शोधकी स्थितिमें भी न आये थे, बदायूनीका प्रामाणिक कथन एवं चन्तायनकी एक प्रतिका अस्तित्व प्रकाशमें आ चुका था। पर खेदजनक आश्चर्य है कि इन अनुसन्धित्सुओंमेंसे किसीने भी उनपर ध्यान देनेकी आवश्यकता अनुभव नहीं किया। १९५६ ई. में परशुराम चतुर्वेदीने जब अपनी दूसरी पुस्तक 'भारतीय प्रेमाख्यानकी परम्परा' प्रकाशित की तब उन्होंने संदिग्ध भावसे कहा कि राजस्थानमें एक उपलब्ध अधूरी प्रतिके अनुसार चन्तायनका रचना-काल सं० १४३६ होना चाहिये। इस प्रकार १९२८ ई. से लेकर १९५६ ई. तक सूफी साहित्य और प्रेमा- ख्यानक काव्योंको लेकर शोधका डिंडोरा तो खूब पिटा, पर हिन्दी साहित्यके विद्वानों और अनुसन्धित्सुओंकी जानकारी इस बाततक ही सीमित रही कि दाऊदन चन्तायन नामक कोई प्रेमाख्यानक काव्य लिखा था। उसकी एक प्रति उन्हें ज्ञात भी हुई तो उसकी ओर समुचित ध्यान ही नहीं दिया गया। लोग रामकुमार वर्माकी धुरी पर चक्कर काटते रहे। चन्तायनकी प्रतियोंकी खोजका वास्तविक काम ऐसे लोगोंने आरम्भ किया जिनका सम्बन्ध हिन्दी साहित्यसे कम पुरातत्त्व और इतिहास से अधिक है। यह कार्य उन्होंने १९५१-५३ ई. में ही आरम्भ कर दिया था। चन्तायनकी ओर सर्वप्रथम १. जायसीके परवर्ती हिन्दी सूफी कवि और काव्य, लखनऊ, सं० २०११ पृ. ११८। २. सूफीमत और हिन्दी साहित्य, दिल्ली, १९५५ ई., पृ. ११२। ३. नागरी प्रचारिणी पत्रिका, वर्ष ५४, सं. २, ३, पृ. ४२। ४. भारतीय प्रेमाख्यान की परम्परा, प्रयाग, १९५६ ई., पृ. ८८।