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चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

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१४४ छूटहिं। बाजहि जहाँ पाँक लगि फूटहिं ॥ (पद्मावत ५२४।१) में पाँककी व्युत्पत्ति पुन्तसे मान कर वासुदेवशरण अग्रवालने अथ में इसे पंख किया है। वृहद हिन्दी कोषमें इसे तीरके पीछेकी ओर का सिरा बताया गया है। ये दोनों अर्थ भी संगत नहीं हैं। अंजुमन- इस्लाम उर्दू रिसर्च इन्स्टीट्यूट (बम्बई) में एक समकालीन हिन्दी- अरबी-फारसी कोष की हस्तलिखित प्रति है। उसमें इस शब्दका अर्थ मुकीश बताया गया है। यही अर्थ ठीक भी है।

११५ (रीडींग्स ४३) सिफते रथे अनी गोबद (रथ-वर्णन) साजे रथ बितानहि कद्दे । सौ-सौ धानुक एक-एक चढ़े ॥१ हुके आय इनैं तहँ धनैं । तीन चार सै बभै गुनें ॥२ जोयन बीस गरथइ चलावहिं । खिन एक माँझ बहुरि तिहँ आवहिं ॥३ ठौर ठौर ले रन महँ घरे । जनु बोहित सागर महँ तिरे ॥४ रथ क अरथ ग्रह किन्हें कीन्हा । कर हर मुख जे सँहा दीन्हा ॥५ देख झझार राइ कै, गरबर रहे तँधाइ ।६ बहुत चले राइ औ राउत, पीइ छोक मो भाइ ॥७ टिप्पणी—(३) जोयन—योजन । (४) बोहित—जहाज । सावर—सागर ।

११६ (रीडींग्स ४४) सिफते पैकान महर (हथि वर्णन) गज गवनें डर साँसों मयउ । बासुकि (नाग) पतारहिं गयउ ॥१ झिंकत इंदरासन डर होई । कापहिं पाठ न अँगबइ कोई ॥२ घड़े महावत कसैं उपनारे । दाँत पतर मह छैंड़ सिंगारे ॥३