भारतकोश
चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

DevanagariAwadhipublished520 पृष्ठ

पृष्ठ 230, कुल 520 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 230

२१ ऊँच पोल तो चेरी जागहिं । चोर देखि भय जीयें लागहिं ॥४ छाड़ न केम घरसि दइ फेरा । करहि गुहार चोर महिं हेरा ॥५ मन रहँसै धनि अस कहै, जिये आस तुलान ।६ दयी ठाँठ जो माँगेउँ, सो महँ सरबस आन ॥७ पाठान्तर—पंजाब प्रति— शीर्षक—अंश अप्राप्य है । १—सूख । २—गुहरवा । ३—पूरी पंक्ति अप्राप्य है । ४—चोर देखि बहु जियसे डरारहिं । ५—पंक्ति ६-७ वाला अंश कट गया है । टिप्पणी—(१) बेर—समय । गढ़ी—पकड़ा । बारी—बाला युवती । (२) नियरेँ—निकट । गुहरावा—पुकार लगाऊं । (५) हेरा—देखा । (६) तुलान—पूरी हुई । (७) गुहार—पुकार । (८) सरबस—सर्वस्व सब कुछ । २१० ( रोकेण्ड्स १६१ ) जवाब दादने लोरक मर चाँदा रा बानरमी ( लोरुकका चाँदासे धीरे कहना ) मन अचरत छनि भीमर छोली । अपने जनम न कीन्हेउँ चोरी ॥१ आयउँ तोरैं नेह कुंवारी । कही चोर आँ दीन्ही गारी ॥२ चोर होवेउँ तोर अमरन लेवेउँ । पूर गहन ऊँ ऊघदि देवेउँ ॥३ घरी केम तूँ महिँ गुहरावसि । सोवत लोग फेरि अरय जगापसि॥४ अमरन काज न आयइँ मोरे । रूप भुलानेउँ चाँदा तोरें ॥५ तोहि लागि जो मरेउँ, नेह न छाडेउँ काउ ।६ पिरत तुम्हार लाग मोर हिरदें, जै दिठ बिनु आइ तो खाउ ॥७ टिप्पणी—गुहरावसि—पुकारती हो ।