चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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सीरीज़का नाम दिया है।१ फलतः कला भवनवाले चित्र भी लौर चन्दा सीरीज़के दूसरे नमूनेके रूपमें स्वीकार किये गये। रामपुर, काशी और पंजाबकी इन तीन प्रतियोंके अतिरिक्त एक चौथी प्रति की जानकारी १९५३-५४ ई. में हुई। पटना कालेजके इतिहासके प्राध्यापक सैयद् हसन असकरी इतिहासके विद्वान होनेके अतिरिक्त उर्दू-हिन्दी साहित्यके प्रति भी रुचि रखते हैं और प्राचीन हस्तलिखित ग्रन्थोंकी खोज उनका व्यसन है। अपने इस व्यसनके परिणाम स्वरूप उन्हें अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थोंको प्रकाशमें लानेका श्रेय प्राप्त है। उस वर्ष मनेरशरीफके खानकाहके सज्जादनशीन और उनके भाई मौलवी मुरादुल्लम्के पुराने बस्तोंके बस्तोंको टटोलते हुए उन्हें चन्दायनके ६४ पृष्ठोंकी एक खण्डित प्रति मिली। वे उस समय केवल इतना ही जान सके कि वह हिन्दीका कोई अज्ञात ग्रन्थ है। संयोगसे वासुदेवशरण अग्रवाल उन्हीं दिनों पटना गये। असकरीने उन्हें वह ग्रन्थ दिखाया। तब सूक्ष्मरीक्षण करनेपर ज्ञात हुआ कि वे चन्दायके ही पृष्ठ हैं। तदनन्तर असकरीने इस प्रतिके सम्बन्धमें अंग्रेजी और उर्दूके पत्रोंमें कई लेख प्रकाशित किये।२ इस प्रतिके ज्ञात होनेके कारण ही चन्दायनकी एक अन्य प्रतिका पता चला। यह प्रति भी खण्डित है। इसमें भी ६४ पृष्ठ हैं; किन्तु इस प्रतिकी विशेषता यह है कि उसके पृष्ठ चित्रित हैं। काशी और पंजाबवाली प्रतियोंकी तरह ही इनके एक ओर चित्र और दूसरी ओर फारसी लिपिमें आलेख हैं। यह प्रति भोपालके एक मुस्लिम परिवारमें थी। उसके स्वामी चित्रोंके कारण उसे मूल्यवान तो समझते थे पर वे चित्र वस्तुतः क्या हैं, इसका उन्हें कुछ पता न था। १९५४ ई. में जब भारतीय पुरातत्त्व विभागके अरबी फारसी अभिलेखोंके विशेषज्ञ जियाउद्दीन अहमद देसाई भोपाल गये तो उन्हें यह चित्राधार दिखाया गया। देसाई उन्हीं दिनों पटना होकर आये थे और असकरीने उन्हें अपनी चन्दायनकी प्रति दिखायी थी। अतः उन्हें भोपालवाली प्रतिको उलटते-पुलटते हुए यह समझनेमें देर न लगी कि वह भी चन्दायनकी ही प्रति है। तब चन्दायनकी सचित्र प्रतिके रूपमें उसका महत्त्व बढ़ गया और उसे १९५५ ई. में बम्बईके प्रिंस आफ वेल्स म्यूजियमने क्रय कर लिया। काशीवाले पृष्ठ मेरे शोधसे प्रकाशमें आये यह ऊपर कहा जा चुका है। भोपालवाली प्रति उस संग्रहालयमें है, जहाँ मैं काम करता हूँ। अतः इन दोनों ही प्रतियोंपर काम करनेका अधिकार मेरा था ही। मनेरशरीफ वाली प्रतिका विवरण असकरी पहले ही प्रकाशित कर चुके थे। उनकी प्रतिके उपयोग करनेमें कोई बाधा थी ही नहीं। फलतः इन प्रतियोंके आधारपर चन्दायनको प्रस्तुत करनेका कार्य मैंने आरम्भ किया। १. मार्ग बम्बई, भाग ४ अंक १ पृ. २४। २. करेंट स्टडीज पटना कालेज १९५५ ई. पृ. ९-१६ पटना युनवर्सिटी जर्नल १९५ ई. पृ. १६०। प्रवाहित पटना अप्रैल १९५ ई. अंक ११ पृ. ५४-५४।