भारतकोश
चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

DevanagariAwadhipublished520 पृष्ठ

पृष्ठ 25, कुल 520 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 25

१ बम्बई (भोपाल) वाले चन्दायण के पृष्ठों के पाठोद्धार (फारसी लिपि से नागरी लिपि में रूपान्तरित करने) का काम समाप्त कर उसके पाठ के स्वरूप का अन्तिम निश्चय कर ही रहा था कि माताप्रसाद गुप्त ने प्रयाग विश्वविद्यालय के माध्यम से और विश्वनाथ प्रसाद ने आगरा विश्वविद्यालय के हिन्दी विद्यापीठ के माध्यम से बम्बई वाली प्रति के फोटो-प्रिंट की माँग की। तब ज्ञात हुआ कि वे दोनों विद्वान भी संयुक्त रूप से अन्य दो प्रतियों के सहारे चन्दायण पर काम कर रहे हैं। चूँकि मैं बम्बई वाली प्रति पर काम कर रहा था नियमान्तः संग्रहालय से उन्हें उसके फोटो प्रिंट आदि नहीं दिये जा सकते थे। किन्तु यह मानकर कि वे लोग हिन्दी साहित्य के जाने माने विद्वान हैं मेरी अपेक्षा वे इस ग्रन्थ के साथ अधिक न्याय कर सकेंगे मैंने आगे कार्य करना स्थगित कर दिया और उनकी माँगों के अनुसार प्रयाग विश्वविद्यालय को चन्दायण के पृष्ठों के फोटो नेगेटिव और आगरा हिन्दी विद्यापीठ को फोटो प्रिंट भिजवा दिये गये। कुछ काल पश्चात् माताप्रसाद गुप्त ने संग्रहालय के डायरेक्टर मोतीचन्द्र को लिखा कि बम्बई वाली प्रति का मेरा तैयार किया हुआ पाठ भी उन्हें भेज दिया जाय। मैंने उसका कार्य स्थगित कर दिया था इस कारण उसके प्रति मेरा कोई मोह न था। मैंने अपने पाठ की एक टाइप की हुई प्रति उन्हें भेज दी। कुछ दिन पश्चात् असकरी का एक लेख देखने में आया जिसमें उन्होंने बम्बई वाली प्रति (जिसकी चर्चा उन्होंने भोपाल प्रति के रूप में किया है) की एक टाइप की हुई कापी उदयशंकर शास्त्री (आगरा हिन्दी विद्यापीठ के एक अधिकारी) द्वारा प्राप्त होने की बात कही थी और उसके कुछ उद्धरण भी दिये थे। १ असकरी ने जिस टाइप की हुई प्रति से देखा वह प्रति मेरी वाली प्रति थी अथवा विश्वनाथ प्रसाद और माताप्रसाद गुप्त की अपनी तैयार की हुई कोई स्वतन्त्र प्रति इसके निर्णय और विचार में जाने की आवश्यकता नहीं। कहना केवल इतना ही है कि संग्रहालय से किसी को जब किसी वस्तु की प्रतिलिपि या फोटो आदि दी जाती है तो उस व्यक्ति से यह अपेक्षा की जाती है कि वह उसपर स्वयं काम करेगा और उस सामग्री को अपने तक ही सीमित रखेगा और प्रकाशन से पूर्व संग्रहालय के अधिकारियों से समुचित अनुमति ले लेगा। पर यह सौजन्य वे लोग निभा न सके। इसी बीच ग्वालियर के हरिहर निवास द्विवेदी बम्बई आये। वे उन दिनों चन्दायण की कथा से सम्बन्ध रखने वाले एक अन्य काव्य ग्रन्थ मैंगासत पर काम कर रहे थे। दुराग्रह करके वे भी मेरे वाचन की एक प्रति ले गये। ले जाते समय उन्होंने बार-बार आश्वासन दिया था कि वे मेरे वाचन को अपने तक ही सीमित रखेंगे और उसे प्रकाशित न करेंगे और मेरी प्रति मुझे शीघ्र ही लौटा देंगे; किन्तु ग्वालियर जाते ही वे अपना वचन भूल गये! अपनी पुस्तक में उन्होंने मेरे वाचन को अनुचित ढंग से उद्धृत तो किया ही बार-बार तकाजा करने पर भी मेरी प्रति लौटाना तो दूर पत्रोत्तर देने का सौजन्य भी उनसे न हो सका। १. पटना यूनिवर्सिटी जर्नल, १९६१ पृ. ६१।