भारतकोश
चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

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२१८ टिप्पणी—(१) अबसि—अवश्य। (२) सेवैं—नाहक। २४३ (रीडिंग्स १९१) गुफ़्तन शबुन मैना लोरक रा पागुस्सा (मैनाका लोरकको क्रुद्ध होकर उत्तर देना) तिन्हें कै भाव चढ़ायहु लोरा। जिन्ह सेवैं मन लागेउ तोरा ॥१ सनि मारग जो कुमारग जाई। सो कस मुख दरसावइ आई ॥२ मुद्ध सान्त अनु कछु न बानें। माँगत पान तो पानी आनें ॥३ जे छँद नौखंड गावैहु आयी। ते लोरफ तुम्ह कहवाँ पायी ॥४ सेस छाड़ तूं सरगहिं जायी। चाँदहि रँगइ कर आन [बतायी]* ॥५ पहान मोल मइँ ईंफस, जानसु कछु न जान ।६ नार फीन्ह तें पाठर, तिह पथ भूल सयान ॥७ २४४ (रीडिंग्स १९२) जवान ; तरसानीदने लोरक बर मैना रा (उत्तर; लोरकका मैनाको डराना) अस धनि पुरुख सो बेग मरावा। आन सैंपोप अस उत्तर आवा ॥१ ठाकुर क थिय परजहि लावा। अइस ध्रें लै मुँह कुटारा ॥२ सरग खाँद परि लोरक आहा। इन्ह पातँ दुनि कहिये काहा ॥३ सरग गय पनि बहुरि न आवइ। तियतैं सरगहि जान न पावइ ॥४ जाँ बा तुम हम सरग पठाउब। सरग गयें का बहुरि न आउन ॥५ जीम सँकारहु मैनाँ, हाइ पहुत सञ्जियाउ ।६ थिय महँ सरग पठानहु, हम सो कहौं मिराउ ॥७