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चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

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पहिर कै चाँद चउँ दिसि दीठी । जनु तरई चहुँ पास बईठी ॥२ न्हाइ धोइ कै चीर पहिरावा । अगर चंदन लाइ सीस गुंघावा ॥३ सेंदुर छिड़क भइ रतनारी । मुँह तंबोल सब जोवन भारी ॥४ इँदर सबद पँच तूर बजायीँ । गरह नखत चलिफो किस आयीँ ॥५ सोन सिंघासन चढ़ी, बहुकन कियउ सवार ।६ चाँद तरायीं सेवैं, गथनीं बैठ दुआर ॥७ टिप्पणी—(५) इँदर सबद—इन्द्रके अखाड़ेमें अप्सराओंके नृत्यके समय बजनेवाले वीणा वेणु मृदंग कांस्य ताल आदि वाद्य । पँचतूर—पालि साहित्य में पञ्चङ्गिक तूर्यिका उल्लेख पाया जाता है। मध्यकालीन ताम्रशासनोंमे पञ्चशब्द और पञ्चमहाशब्द पाये जाते हैं जिससे ऐसा जान पड़ता है कि उसका उपयोग कुछ विशिष्ट सामन्त ही कर सकते हैं। डाक्टर अल्तेकरके मतानुसार श्रृंग शंख भेरी जयघण्ट टमट, ये पाँच वाद्य पञ्चमहाशब्द कहे जाते थे (राष्ट्रकूट, पृ २६९)। सम्भवतः पञ्चशब्दको पञ्चतूर भी कहते थे। किन्तु वासुदेवशरण अग्रवालका अनुमान है कि पञ्चतूर नौबतके लिए प्राचीन शब्द है। (६) सिंघासन—विशेष प्रकारकी पालकी । 'सुगासन' पाठ भी सम्भव है। 'सुगासन' पाठ माताप्रसाद गुप्तने पद्मावत (६१९।१) में स्वीकार किया है। तदनुसार हमने भी वही पाठ ग्रहण किया था और कड़वक ५ और ५१ में वही पाठ दिया भी है। पर वासुदेवशरण अग्रवालने इस बातकी ओर ध्यान आकृष्ट किया कि आइन-अकबरी (ब्लाकमैन कृत अनुवाद, पृ २६४) में अबुल फज्लने पालकी सिंहासन चौडोल और डोली चार प्रकारके यानोंका उल्लेख किया है जिन्हें कहार (पालकीबरदार) कन्धेपर उठाकर चलते थे। अतः हमने यहाँ और आगे सर्वत्र 'सिंहासन' पाठ स्वीकार किया है। पाठक पीछे इस पाठका सुधार लें। पालकीके अर्थमे सुगासनका कहीं उल्लेख नहीं मिलता। बहुकन—बहुद्दारक । (७) सेवैं—टाँकि ।